मरने से पहले मरना सीखलो
प्रिय दोस्तों, हमने जिंदगी में बहुत कुछ जान लिया पर एक बात नहीं जाना कि हमें मरने के बाद कहाँ जाना है।
कभी आप अंधेरे अनजान घर में घूमे हैं ? नहीं न ? इसी तरह वह आध्यात्मिक मण्डल भी अगम, अचिन्त्य है जहां मन, बुद्धि, इन्द्रियों की गम नहीं है। फिर किसके भरोसे बैठे हो? कब तक अज्ञानता के अंधेरे में घूमते रहोगे? अभी तक जो दर्पण में देखते हो खुद को वही अपना स्वरूप मानते आए हो। यही भ्रम है। जो माता के गर्भ में पांचवें महीने में प्रवेश करती है व म्रत्यु के समय शरीर को छोड़कर निकस जाती है, वह सूक्ष्म आत्मा ही आपका वास्तविक स्वरूप है। कभी उस सूक्ष्मता को महसूस किया है?
हम तपस्वी ऋषियों मुनियों के पावन देश में जन्म लिए हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को तप साधना द्वारा साक्षात्कार किया और उसीमें परमात्मा को प्रत्यक्ष किया। उसकी एक विधि है, टेक्निक है।
हमारे शरीर में एक ऐसा छेद है, ब्रह्मरंध, जिससे आत्मा की चेतन किरण -सुरति जब योग पुरुषार्थ द्वारा निकल कर उर्ध्व प्रदेश में गमन करती है तो दिव्य मण्डलों के दर्शन होते हैं। योगी गगन मण्डल में सुरति को स्थिर कर स्वयं की आत्मा के दर्शन करता है। अक्षर ब्रह्म के , परमाणु मण्डल के, सद्गुरु मण्डल के दर्शन करता है।
यही जीवन का परम पुरुषार्थ है वरना भूखे तो जानवर भी नहीं सोते हैं, बच्चे तो वे भी पैदा करते हैं, right? मनुष्य शरीर की ही विशेषता है कि इसमें एक गुप्त द्वार है- “ब्रह्मरंध्र” जिसे सन्तों ने ‘हरिद्वार’ यानि हरि से मिलने का दरवाजा भी कहा है। यह टेक्निक सीखने के लिए कोई फीस, शर्त, नहीं है। बस साहसी, पुरुषार्थी आत्माएं जिनका विवेक जगा हो वह लोक कर्तव्य के साथ इसे भी अपने दैनिक जीवन का अंग बना लेते हैं। मुझे नहीं पता आपमें से कौन वह पुण्यात्मा है जो इस शरीर को आखरी शरीर बनाने के बारे में सोच भी रहा है। यह सुअवसर हमें विहंगम योग की साधना से सुलभता से मिल रहा है अतः जीवन का मूल्य समझें।
vihangamyoga.org











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