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अपनी गठरी टटोलें*

अपनी गठरी टटोलें*
पढ़ने से पहले… प्यार से अपनी आँखें बंद करें… और अपने प्यार भरे हृदय की गहराई में उतरे… कुछ पल के लिए वही रहे… फिर पढ़ना जारी रखें…

अपनी गठरी टटोलें

जिंदगी की इस यात्रा में हमारी निगाह कहाँ है और कहाँ होनी चाहिए…..

एक बार दो आदमी यात्रा पर निकले। यात्रा के दौरान दोनों की मुलाकात हुई, बातों-बातों में दोनों को पता चला कि दोनों की मंजिल एक ही थी, तो दोनों यात्रा में साथ हो चले। यात्रा साथ करते-करते सात दिन बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा, “भाई साहब! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे, क्या आपने मुझे पहचाना की मैं कौन हूं?” दूसरे ने कहा, “नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।”

पहला यात्री बोला, “महोदय, मैं एक नामी ठग हूँ परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरु निकले।”

दूसरा यात्री बोला “कैसे?”

पहला यात्री, “कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है?ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि आप बिल्कुल खाली हाथ हैं।”

यह सुनकर दूसरा यात्री बोला, “मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी-सी रजत मुद्राएँ है।”

यह सुनकर पहला यात्री बड़ी हैरानी के साथ बोला, “तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?”

दूसरे यात्री ने हंसकर उत्तर दिया कि,
“मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और मुद्राएँ तुम्हारी पोटली में रख देता था और तुम सात दिन तक मेरी झोली टटोलते रहे। इसलिए मुझे अपनी पोटली सँभालने की जरूरत ही नहीं पडी। तो फिर तुम्हें कुछ मिलता कहाँ से?”

यही समस्या हर इंसान की है। आज का इंसान अपने सुख से सुखी नहीं है। दूसरे के सुख से दुखी है क्योंकि निगाह सदैव दूसरे की गठरी पर होती है!

ईश्वर नित नई खुशियाँ हमारी झोल़ी में डालता है परन्तु हमें अपनी गठरी पर निगाह डालने की फुर्सत ही नहीं है। यही सबकी मूलभूत समस्या है। जिस दिन से इंसान दूसरे की ताक झाँक बंद कर देगा उस क्षण सारी समस्या का समाधान हो जाऐगा!

*अपनी गठरी टटोलें! जीवन में सबसे बड़ा गूढ मंत्र है स्वयं को टटोले और जीवन-पथ पर आगे बढ़े, सफलताये हमारी प्रतीक्षा में है
*”स्वयं को शुद्ध करने के लिए हमें अपनी उन सभी आदतों और भावनाओं को सुधारना होगा जो सद्चरित्र एवं संस्कृति के विरुद्ध हैं, साथ ही सभी प्रवृत्तियों को भी परिष्कृत करना होगा ताकि हम स्वयं की परिपूर्णता तक पहुँच सकें।”*   
*लालाजी महाराज*

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