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Man ki Sundarta , मन की सुंदरता ,हृदय को स्पर्श करने वाली कहानी

20211022 201407

महसूस करें – मैं कृतज्ञ हूँ, ह्रदय की पवित्रता, सरलता और प्रेम के लिए

मन की सुंदरता

मैं आज आपको अपने जीवन का एक किस्सा सुनाती हूँ। काफी साल पहले की बात है, जब हमारा घर बाल्टीमोर में जॉन्स हॉपकिन्स अस्पताल के प्रवेश द्वार से सीधे सड़क के उस पार था। हमारा घर दो मंजिला था। हम नीचे की मंजिल पर रहते थे और अस्पताल में आने वाले बाहर के मरीजों को ऊपर के कमरे किराए पर देते थे।

एक दिन गर्मी की शाम जब मैं खाना बना रही थी, दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला, मेरे सामने एक भयानक दिखने वाला आदमी खड़ा था। वह मेरे 8 साल के बच्चे से शायद ही कुछ लंबा था। उसका चेहरा सूजन से एक तरफ लाल हो रहा था और वहां की चमड़ी भी कच्ची थी। अचानक से ऐसे व्यक्ति को अपने सामने देखकर मैं अंदर से डर गई। भले ही उसका चेहरा डरावना था फिर भी उसकी आवाज़ मधुर थी। उसने अपनी मधुर आवाज में कहा, “शुभ संध्या। मैं आज सुबह पूर्वी तट से इलाज के लिए आया था और अब अगली सुबह तक कोई बस नहीं है। इसीलिए मैं यहाँ देखने आया हूँ कि क्या आपके पास सिर्फ एक रात के लिए कमरा है?”

उसने मुझे यह भी बताया कि वह दोपहर से एक कमरे की तलाश कर रहा था, लेकिन उसे कहीं भी कमरा नहीं मिला।

उस व्यक्ति ने फिर से मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे पता है कि मेरा चेहरा बहुत ही भयानक लग रहा है, लेकिन मेरे डॉक्टर इसका उपचार कर रहे है।”

इतना सुनते ही मैं एक पल के लिए झिझकी, लेकिन उसके अगले शब्दों ने मुझे आश्वस्त किया और वह शब्द थे कि “मैं पोर्च पर इस रॉकिंग चेयर में सो सकता हूँ, क्योंकि मेरी बस सुबह जल्दी आएगी।”

उसकी बात सुनकर मेरा हृदय गदगद हो उठा और फिर मैंने उनसे कहा कि हम उनके लिए एक बिस्तर लगा देंगे। मैं अंदर गयी और रात के खाने की तैयारी खत्म करके जब मैं खाना खाने को तैयार हुई, तो मैंने उस आदमी से पूछा कि क्या वह हमारे साथ खाना खाने को आएंगे?

उसने बड़े प्यार से उत्तर दिया: “नहीं, धन्यवाद। मेरे पास खाने को बहुत कुछ है।” ऐसा कहते हुए उसने एक भूरे रंग का कागज़ का खाने का पैकेट दिखाया। कुछ देर के बाद जब मैंने खाना समाप्त कर लिया, तो मैं उसके साथ कुछ मिनट बात करने के लिए बरामदे में गई। कुछ मिनटो की बात के बाद मुझे यह जानने में देर नहीं लगी कि इस आदमी के पास उस छोटे से शरीर में एक बड़े आकार का दिल था।

उसने मुझे बातों-बातों में बताया कि वह अपनी बेटी, उसके पति जो पीठ की चोट से बुरी तरह से अपंग हो गए थे और उसके 5 बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए मछली पकड़ने का व्यवसाय करते हैं।

उसने यह शिकायत के माध्यम से नहीं बताया बल्कि उसके हर एक शब्द में सबके लिए आशीर्वाद और भगवान के लिए शुकराना निकल रहा था। वह प्रभु का बहुत ही आभारी था क्योंकि उसे उस बीमारी से कोई दर्द नहीं हुआ, जो जाहिर तौर पर त्वचा कैंसर का एक रूप था। उसने भगवान को बहुत धन्यवाद दिया कि उसने उसकी चलते रहने की शक्ति बरकरार रखी।

सोते समय हमने उसके लिए बच्चों के कमरे में एक खाट बिछा दी। जब मैं सुबह उठी, तो मैं क्या देखती हूँ कि बिस्तर खाली पड़ा है और वह छोटा आदमी बाहर बरामदे में जाने को तैयार खड़ा था। उसने नाश्ता करने से भी इनकार कर दिया।

वह अपनी बस के लिए रवाना होने से ठीक पहले, थोड़ा रुकते हुए, जैसे कि कोई बड़ा एहसान माँग रहा हो, कहने लगा, “कृपया, क्या मैं वापस यहाँ आ सकता हूँ? और अगली बार जब मैं इलाज के लिए यहाँ आऊंगा तो मैं आपको मेरी वजह से कोई तकलीफ नहीं दूँगा। मैं एक कुर्सी पर ठीक से सो सकता हूँ।”

वह एक पल रुका और फिर उसने बड़ा प्यार जताते हुए कहा, “आपके बच्चों ने मुझे घर जैसा महसूस कराया। बड़ों को तो मेरे चेहरे से परेशानी होती हैं, लेकिन आपके बच्चों को कोई परेशानी नही हुई।” मैंने उनसे प्यार भरे दिल से कहा कि उनका फिर से आने के लिए स्वागत है।

और, कुछ दिनों बाद वह अपनी अगली यात्रा पर, सुबह 7 बजे के करीब हमारे यहां पहुँचा, तो वह उपहार के रूप में, एक बड़ी मछली और अन्य सब्जियां उपहार में लाया। मुझे यह सोचकर बड़ी हैरानी और परेशानी हुई कि उसकी बस सुबह 4:00 बजे निकली होगी और हमारे लिए उससे भी पहले उठकर यह सब लाने की तैयारी करने के लिए उसे कितने बजे उठना पड़ा होगा?

उसके बाद यह सिलसिला लगातार जारी रहा। जितने भी साल वह हमारे साथ रात भर रहने आये थे, ऐसा कोई समय नहीं होता था कि वह हमारे लिए अपने बगीचे से मछली या सीप या सब्जियाँ नहीं लाये हो और कभी बीच में वह न भी आ सके तो वह हमें मेल के जरिए पैकेज भी भेजता रहा, हमेशा विशेष डिलीवरी द्वारा। पैकेज में मछली,सब्जियां विशेष तौर पर ताजा पालक के पत्ते जिन्हे बड़े ध्यान से धोया जाता था और विशेष ध्यान रख के बहुत अच्छी तरह पैक किया जाता था। यह जानकर कि उसे इन्हें भेजने के लिए उसे 3 मील चल के जाना होगा, मेरे लिए, उन उपहारों की कीमत पहले से दोगुनी हो जाती थी।

जब मुझे यह छोटी-छोटी यादें मिलीं, तो मैं अक्सर एक टिप्पणी के बारे में सोचती थी, जो हमारे पड़ोसी ने उस पहली सुबह उस व्यक्ति के जाने के बाद की थी। “क्या तुमने उस भयानक दिखने वाले आदमी को कल रात अपने कमरे में रखा था? मेरे पास भी वह आया था मगर मैंने उसे वहाँ से दूर कर दिया! आप इस तरह के लोगों को कमरे में रहने देंगे तो आपके यहाँ दूसरे लोगों का आना बंद हो सकता हैं!”

हो सकता है कि हमने एक या दो बार रूमर्स खो दिए हों। लेकिन मुझे उसके लिए कोई पछतावा नहीं है। लेकिन, अगर वे उस व्यक्ति को जान पाते, तो शायद उसकी बीमारियों को सहना आसान होता। मैं हमेशा उस व्यक्ति की आभारी रहूंगी जिसने मुझे और मेरे परिवार को यह सिखाया की बिना किसी शिकायत के तकलीफ को स्वीकार करना और भगवान के प्रति कृतज्ञता के साथ अच्छाई को स्वीकार करना क्या है?

हाल ही में थोड़े दिन पहले मैं एक दोस्त से मिलने जा रही थी जिसके पास एक ग्रीनहाउस है। जैसे ही उसने मुझे अपने ग्रीनहाउस की सैर कराई और उसमें खिले अपने फूल दिखाए, मैं सबसे खूबसूरत एक सुनहरे गुलदाउदी के पास आई, लेकिन मैं यह देख कर बड़ी आश्चर्यचकित हो गई कि यह एक पुरानी, ​​जंग लगी बाल्टी में बढ़ रहा था। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर यह मेरा पौधा होता, तो मैं इसे अपने सबसे प्यारे कंटेनर में रख देती!”

लेकिन कुछ ही क्षण में मेरी दोस्त ने मेरा मन बदल दिया। उसने बताया कि “मेरे पास बर्तनों की कमी थी और मैंने सोचा कि यह फूल अपने आप में बहुत सुंदर होगा और इस फूल की सुंदरता के आगे पुरानी बाल्टी, जिसमें मैं इसे उगाने जा रही हूं उस पर कोई गौर नहीं करेगा। और वैसे भी यह थोड़े दिन की ही बात होगी क्योंकि जब यह और बड़ा हो जाएगा तो मैं इसे बाहर बगीचे में रख दूंगी।”

यह सुनकर मैं खुशी से हँसने लगी। मेरी दोस्त मन ही मन सोच रही होगी कि मैं इतनी खुशी से क्यों हँसी, लेकिन मैं स्वर्ग में ऐसे ही एक दृश्य की कल्पना कर रही थी जहाँ भगवान ने भी उस भयानक दिखने वाले आदमी की सुंदर आत्मा को देखकर यही सोचा होगा कि इस छोटे से शरीर में इस सुंदर आत्मा की शुरुआत करने में कोई आपत्ति नहीं होगी।

परमात्मा उन वस्तुओं को नहीं देखता जिन पर मनुष्य की दृष्टि रहती है। मनुष्य को बाहर का रूप दिखता है, परन्तु परमात्मा की दृष्टि मन पर रहती है।

सोचें……..अगर हमारी आंखें, शरीर के बजाय आत्मा को देखे, तो हमारे लिए सौंदर्य के मायने कितने अद्भुत होंगे!
“जब हम स्वीकार करना और प्रेम करना सीख लेते हैं, तब हमारे जीवन का हर पहलू फलने-फूलने लगता है।”  
दाजी  

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