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आत्म ज्ञान जानों नहीं, कर्म दियो छिटकाय। तुलसी ऐसी आत्मा, सहज नरक मंह जाय।।

आत्म ज्ञान जानों नहीं, कर्म दियो छिटकाय। तुलसी ऐसी आत्मा, सहज नरक मंह जाय।।

हम सभी दुनियां‌ जहान को जान लिए। परन्तु अपने आप को अभी तक नहीं जाना कि मैं कौन हूँ? इस जगत का आधार कौन है? जगत की उत्पत्ति‌ कैसे हुयी? इस भवसागर से कैसे पार होंगे? यानि आवागमन कैसे छुटेंगे? मानव का सत्य कर्तब्य क्या है? हमें सुख- दुख कैसे मिलता है? कौन देता है? हम सभी बन्धन और मुक्ती अवस्था को कैसे प्राप्त करते हैं? सत्य मार्ग क्या है यानि——-
कर बिचार मैं कौन हुँ, को है जगदाधार।
कैसे जग उत्पन्न है, लीन कौन बिधि पार।

कौन सत्य कर्तब्य है, दुख सुख कैसे होय।
बद्ध मुक्त केहि भांति सो, ग्रहण करौं सत सोय।।

क्या आपने अभी तक आत्म दर्शन किया? नहीं किया। इसलिए हीआप, हम सभी कर्म करते जा रहे हैं, और फल भोगने के लिए बार- बार जन्म लें रहे हैं। यदि आप राम को मानते हैं, रामायण को मानते हैं तो रामायण के कथन को अपने आचरण व्यवहार में उतारना है । रामायण में कहा गया है कि–
सुख की लहहीं द्विज अनहित कीन्हे। कर्म की होहिं स्वरुपहिं चिन्हें।

अर्थात् अपने आत्म स्वरुप में स्थित होने पर, जो आप कर्म करेंगे उसका फल नहीं बनेगा। क्योंकि वह कर्म की श्रेणी में नहीं आता है। वह अकर्म की श्रेणी में आता है।
आत्मा तो भीतर है। उसे जानने के लिए संसार के नौवां द्वार को योगयुक्ति से बन्द करके भीतर के पट को खोलना होगा। आप ने अब तक जो भी पूजा पाठ किया। वह सब बाहर‌ बाहर ही किये, तो आत्म ज्ञान कैसे होगा?वस्तु कहीं और ढूंढ़े कहीं और रहे हैं। लोटा में रखे दुध को यदि पाना चाहते हैं। तो‌ पहले लोटे के ज्ञान की आवश्यकता होती है इसी प्रकार परमात्म प्राप्ति से पहले अपने आप को जानने की आवश्यकता होती है।
रामायण में कहा गया है कि धर्म ते बिरति योग ते ज्ञाना, ज्ञान मोक्षप्रद वेद बखाना।

अर्थात् आत्म ज्ञान के लिए सदगुरु शरण में आकर योग साधना करने की जरुरत है।
आत्मा की दो औपाधिक अवस्थाएं होती हैं। मुक्त अवस्था तथा बद्ध अवस्था। मुक्त अवस्था में आत्मा पूर्णतः स्वतन्त्र रहती है, उस पर किसी प्रकार का आवरण नहीं रहता है। वह अपने शुद्ध चेतन स्वरूप में स्थित हो जाती है। मुक्त आत्मा अपनी सोलहो कलाओं से प्रकाशित हो जाती है, जिसमें 16 सूर्य के बराबर प्रकाश होता है। यथा—
षोड़श सूर्य प्रकाश है, सच्चिदानन्द स्वरूप।
आतम अलग आधार में, तन्मय पुरुष अनूप।।
इस तरह आत्मा अपने पूर्ण चेतन स्वरूप में आकर परमानन्द का उपभोग करती है।
दूसरी अवस्था बद्ध अवस्था है, जिसमें आत्मा प्रकृति के प्रवाह में मन एवं प्राण के अधीन होकर नाना प्रकार के कष्टों को झेलती रहती है। ऐसी‌ अवस्था में आत्म सुरति जब प्रकृति जगत में क्रियाशील होती है तो अज्ञान अवस्था में कर्म होता है। और जब आत्म सुरति शुद्ध होकर त्रिपाद अमृत सागर की ओर चलती है। तो इसे ही भक्ति होना कहते हैं। यथा —-
आत्म प्रभा चल प्रकृति में, कर्म होय अज्ञान। शुद्ध प्रभा निःशब्द में, भक्ति परम विज्ञान।।
प्राकृतिक विषय भोग ही जीव के पतन का कारण‌ है। इसलिए इस प्राकृतिक सुख को ऋषियों ने विष तुल्य कहा है। इससे निवृत्ति का एकमात्र उपाय सद्गुरु– शरणागत होकर योगाभ्यास करना है।
इन्द्रियों का स्वामी मन है तथा मन आत्म- सुरती को लेकर आत्मा को, संसारिक विषय भोग के उपभोग में लगाये रखता है। योग युक्ति से मन के प्रवाह को रोका जाता है। एक तन का योग है, एक मन का योग है, एक आत्मा का योग है। और एक इन सबसे परे अक्षर का भी योग है। यथा—-
तन आसन हठयोगी मानें, मन आसन कोई बिरला जानें।
आत्म आसन अद्भूत केला, है रहस्य अन्तर गम मेला। अक्षर आसन शब्द सनेही, शब्द अखण्ड खण्ड यह देही।।
जय #सदगुरुदेव भगवान की जय हो।।🙏🙏

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