मठ,मंदिर और महंथ,शर्मसार हुआ,संत,सियासत और सत्ता से।।
सन्तोष त्रिपाठी संत जी
साहित्यकार
वाराणसी। यह देश मंदिरो का, संतो का, साधुओं का, परंपराओं का, धर्मो का, देवी देवताओं का,तीर्थो का ,फकीरों का,साहित्य का , संस्कृति का
गुरुकुल का, आश्रमों का बुजुर्गो का,त्याग का,तपस्या का,ज्ञान,विज्ञान का , देश माना जाता है,जहा युगों युगों से धर्मस्थल, तीर्थस्थल का सम्मान,उसपर भी तीर्थराज प्रयाग की बात ही निराली है,जिस यज्ञ को स्वर्ग में होना निश्चित हो वो यज्ञ तीर्थराज प्रयाग में हो,कितनी मार्मिक बात होगी,जहा स्वर्ग के सभी देवता आने को लालायित हो,भारद्वाज ऋषि का आश्रम हो, स्वयं महावीर हनुमान लेते हुए हनुमान जी विराजित हो,तीन सौ साल पुराना बघमबरी मठ हो,अखाड़ा परिषद हो वहा के गुरु शिष्य की सियासत में आत्महत्या या हत्या,या वसीयत नामा जैसी बात अगर की जाय तो शर्मनाक होगी,सवाल जीतने किए जाय उतना ही उलझन होता है।
आप ही विचार करे, प्रशासन फासी की फोटो,फांसी का फंदा की फोटो क्यों छिपा रहा,दरवाजा पर धक्का देने लत मारने के निशान क्यों नहीं,तेरह सितंबर को काटकर बीस सितंबर क्यों,सभी पन्नों पर हस्ताक्षर क्यों,मानसिक रोगी सात पन्ने का पत्र कैसे लिख सकता जबकि लिखना ही नहीं आता था,हस्ताक्षर भी मुश्किल से हो पता था, लिखने में बार बार अब्लिक का प्रयोग कैसे, अश्रम में रस्सी का अंदर आना कैसे संभव हुआ ,जब की सुरक्षा गार्ड मौजूद,सिसी टी वी कैमरा बंद हुआ कैसे, आत्महत्या पत्र या वरासत को सार्वजनिक क्यों ,तैंतीस घंटे बाद पोस्टमार्टम क्यों,जबकि चोबीस घंटे में बॉडी का निशान बदल जता है,
तमाम सवाल,पूछता है जन मानस क्या सत्ता के गलियारे में सच की कीमत नहीं,शहर के प्रसिद्ध डॉक्टरों की मौत, तमाम उद्योग पतियो की मौत,भू माफियाओं का शोर , जातिवाद की बदबू,धर्मवाद की बदबू,समाजवाद की नजरो का तीखापन होना , ज्ञान विज्ञान की पराकाष्ठा से सीधे नीचे गिर जाना,संपत्ति,चरित्र का में मस्तिष्क पर काली घटा छा लेना ही इस तीर्थराज के लिए,एक गुरु शिष्य के लिए शोभनीय है,।












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