राहत इंदौरी ने लिखा था कि
सभी का खून है शामिल है यहाँ की मिट्टी में,
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है…???
अब यह पुराना हो गया है ✓ प्रस्तुत है नया :
*ख़फ़ा होते हैं तो हो जाने दो * घर के मेहमान थोड़ी हैं?*
*सारे जहाँ भर से लताड़े जा चुके हैं * इनका मान थोड़ी है?*
*ये कान्हा राम की धरती है * सजदा करना ही होगा,*
*मेरा वतन * ये मेरी माँ है * लूट का सामान थोड़ी है?*
मैं जानता हूँ कि घर में ही बन चुके हैं सैंकड़ों भेदी,
*जो सिक्कों में बिक जाये * वो मेरा ईमान थोड़ी है?*
मेरे पुरखों ने सींचा है इस वतन को अपने लहू के कतरों से,
*बहुत बांटा मगर अब बस हुआ * कोई ख़ैरात थोड़ी है?*
जो रहजन थे उन्हें हाकिम बना कर आयुष्य भर पूजा,
मगर अब हम भी कड़वी सच्चाई से अनजान थोड़ी हैं?
बहुत लूटा है फिरंगी ने तो कभी बाबर के कपूतों ने,
*ये मेरा घर है मेरी ज़ान * मुफ्त की सराय थोड़ी है?*
*बिरले ही मिलते हैं * सच्चे मुसलमान दुनिया में,*
अब हर कोई अब्दुल हमीद और कलाम थोड़ी है?
कुछ तो अपने भी शामिल हैं वतन को तोड़ने में,
अब ये कन्हैया और राविश मुसलमान थोड़ी है?
चूंकि नहीं शामिल है तुम्हारा खून इस मिट्टी में,
आख़िर ये तुम्हारे बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है?
यकीनन किरायेदार ही मालूम पड़ते हैं ये इस मुल्क में,
यूं बेमुरव्वत अपना ही मकान कोई जलाता थोड़े ही है?
सभी का खून शामिल था यहाँ की मिट्टी में हम अनजान थोड़ी हैं,
*किंतु जिनके अब्बा ले चुके पाकिस्तान अब उनका हिंदुस्तान थोड़ी है।











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