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70 के दशक में एक जैसी अर्थव्यवस्था के बावजूद क्यू भारत पिछड़ गया जापान और चीन से… जानने के लिए क्लिक कीजिए

70 के दशक में एक जैसी अर्थव्यवस्था के बावजूद क्यू भारत पिछड़ गया जापान और चीन से… जानने के लिए क्लिक कीजिए
सन् 1970 भारत, चीन जापान की अर्थव्यवस्था व्यवस्था लगभग एक जैसी ही थी ।मगर उन्होने समय को पहचाना और ऐसी नीति व व्यवस्था बनाया कि उनके विकास ने जो गति पकड़ा तो सतत आगे बढ़ता ही चला गया और हमारे देश में राष्ट्रीय दल सारे मिल दलदल बनाते रहे हैं ।भारत के लिए #विकास सिर्फ एक नारा है जुमला है दरअसल सारा खेल नंबर दो का है ।
जापान में इटली में प्रधान मंत्री आते जाते रहते हैं और काम अपनी गति से चल सकता है ।सोचने की बात है 1945 में जापान धूल में मिल चुका था जर्मनी अंतिम सांस गिन रहा था मगर जनता और सरकार ने दोनो ने मिलकर जीरो से हीरो बनने की ठान लिया तो फिर बन ही गये ।
सवाल यह है कि हम ऐसा क्यों नहीं कर सके तो सीधा उत्तर है हमारा संविधान संवैधानिक व्यवस्था और मुर्खों का स्वर्ग लोकतंत्र ।हाईस्कूल, इंटर परीक्षा हुए बगैर सारे बच्चे डिक्टेंशन से पास हो जाये यह भारत में ही सम्भव है ।हमारा अनुभव है कि 1960 तक मजदूरी भले कम थी मगर कोई भी बेरोजगार नही था ।मैकाले शिक्षा पद्धति सिर्फ बाबू क्लर्क व गिनती के क्लास वन सेवा के अधिकारियों को तैयार करती है ।शिक्षा पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि कि पढ़कर निकलने के बाद वह अपने काम में लग जाये न कि बेरोजगार बन के निठल्ला नागरिक बन जाये ।जो जातिगत काम थे पुश्तों दर पुश्तों वो चलता रहता था और जीविका चलती रहती थी मगर शिक्षा व्यवस्था के नाम पर जो स्वप्न दिखाया सारी कार्यसंस्कृति ही पलट गई है सबको कुर्सी और एसी में बैठकर कलम चलाना है ।90% काम तो हाथ पैर मेहनत और पसीना बहाने से होते हैं फिर कैसे शतप्रतिशत लोग कलम चलायेगें ।आपकी नीति है सब पढ़ेगे मगर कितना यह नहीं सोचा जाता है ।
आज चीन की जीडीपी 14 ट्रिलियन डॉलर है, जापान की 5 ट्रिलियन डॉलर है ।और उनके यहॉ कोई बेरोजगार नही है आरक्षण की जरूरत नहीं है ।सात साल में केन्द्र सरकार ने एक नियुक्ति नही किया है फिर आरक्षण झुनझुना छोड़ और क्या है ।आप 73 साल से गरीबी हटा रहे हैं और चीन ने 50 साल से कम समय में गरीबी हटा दिया ।
आप बहुत समझदार हैं तो कोई न कोई कमी है सिस्टम व्यवस्था व्यवहार संविधान में कि हम दिन पर दिन निगेटिव विकास कर रहे हैं ।
वैसे भारतीय लोग इसी लायक है है गधे को शेर बना देते हैं तो मरे और मरे मुझे क्या है ।” जो जस करहि सो तस फल चाखा ” आप जिसके पात्र हैं वो मिल रहा है और मैं खुश हूं ।

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