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आज फिर याद किया,फ़क़ीर जो राजघराने में जन्मा था*

*आज फिर याद किया,फ़क़ीर
जो राजघराने में जन्मा था*

याद था है रहेगा पर मित्रों ने उकेरा कि आज वी पी सिंह का जन्म दिन है “कुछ लिखें”!

मैंने जिनके ज़िन्दाबाद होने के नारे लगाये, जिनकी सोहबत पसंद की, जिन्हे डिफ़ेंड किया और जो उपलब्ध राजनयिकों में हमेशा दूसरे छोर पर मिले उन पर कुछ लिखना…!

आख़िरी वर्षों में “राजा” साहेब (यह संबोधन उन्हे प्रिय था ) सुरक्षा के लिये तैनात सिपाही के साथ अपने दिल्ली के सरकारी बंगले में प्रेस कानफ्रेन्स के पहले माइक बँधवाते , रसोई में जाकर रानी साहिबा को मदद की पहल करते ( प्रेस वालों के लिये नाश्ता रानी अपने हाथों से बनाया करती थीं ), प्रेसनोट की प्रूफरीडिंग करते कैजुअली मिल जाया करते थे । ज़्यादातर किसानों के मसलों पर और मौजूदा आन्दोलनों ( कमज़ोर तबक़ों से जुड़े मसलों पर) के पक्ष में वे स्वयं पेश रहते । उन दिनों लगभग तीसरे दिन उन्हे डायलिसिस के लिये जाना होता था । वे निहायत माइक्रो लेवल पर अपने स्वास्थ्य से जुड़े मामले को जानते थे इसलिये हर पल की क़ीमत जानते थे । हम तमाम लोग उन्हे उस समय तिल तिल खोते जाने के सच से बेबस सिर्फ उपस्थित रह सकते थे कि वे चिर परिचित इलाहाबादी अवधी में पूछ लेते “का हो “…!

अंतिम वर्षों में वे अपने आग्रहों / आदर्शों को लेकर पूरी तरह समर्पित हो गये थे और उन सब से दूर होते गये जो जाति रिश्तेदारी धन या किसी और स्वार्थ से उनसे जुड़े थे ।

उन वर्षों में वे चन्द्रशेखर और सोनिया गांधी से लगातार संपर्क में रहे (हालाँकि प्रधानमंत्री बनने के वक़्त गाँधी परिवार और चन्द्रशेखर से जो वैमनस्य पैदा हुआ था वह बेहद कड़वा था )।

वैचारिक तौर पर वे वामपंथ और आंबेडकरवाद के बहुत करीब पहुँच चुके थे । तमाम रंगों के वाम और दलित पिछड़े राजनैतिक कार्यकर्ता उनसे ऊष्मा लेते रहे ।

सबसे अधिक प्रभाव रानी साहिबा ने अंगीकार किया । दोनों पति पत्नी निजी जीवन में सारे सुख त्यागकर साधारण बनने में शत प्रतिशत ईमानदार होने में लगे रहे जो बेहद प्रभावशाली था ।

याद ही होगा कि जब दूसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी उन्हे आफर हुई तो वे ज्योति बसु के पक्ष में अपनी राय देकर कार में बैठकर दिल्ली के रिंगरोड पर निकल गये और तब लौटे जब दूसरा नेता चुन लिया गया ।

कई बार हम लोगों ने उनके हाथ से बँटीं मिठाइयाँ शेयर की हैं जो पिछड़े समुदाय से आई ए एस / आई पी एस चुने गये युवा उनके लिये लेकर आया करते थे । वे बड़े उछाह से इस ऐतिहासिक बदलाव पर सूक्तियाँ छेड़ते और बताते कि जब वे मुख्यमंत्री बने थे उनके पास उपलब्ध अफ़सरों में एक भी उस तबके का न था ।

भूमि अधिग्रहण की नीतियों के खिलाफ एक विशाल किसान आन्दोलन की उनकी हसरत उनके जीते जी आकार न ले सकी जिसके लिये वे आख़िरी साँस तक यत्न करते रहे पर हिन्दी पट्टी के आज और आने वाले समय के सारे नायक उनके ऋणी हैं जिन्होंने उस ऐतिहासिक झंझावात के समय उनके दृढ़ निशचयी फ़ैसले का फल पाया है ।

वे न्यायप्रिय थे पर हम उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से न्याय न कर पाने के गुनहगार हैं !

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