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ब्रह्मर्षि कुंवर रेवती रमण सिंह

ब्रह्मर्षि कुंवर रेवती रमण सिंह

टेबल पर मुख्यमंत्री का पद रखा था. बगल में ही ईमान पड़ा था. ब्रह्मर्षि कुंवर रेवती रमण सिंह साहब ने ईमान उठाया और चल दिए. टेबल के दूसरी तरफ खड़ा शख़्स भौंचक देखता रह गया. ईस्टमैन कलर पिक्चर के दौर में बड़े परदे पर इस तरह के गढ़े गए किरदारों से आपका वास्ता पड़ा होगा, आपने सीटियां भी बजाई होंगी. लेकिन असल ज़िंदगी में ऐसे मौके मिलने पर लोग लपक लेते हैं. लपलपाने लगते हैं. मौजूद राजनीति में कुंवर साहेब जैसे क़िरदार बमुश्किल मिलते हैं. यहाँ बात हो रही है राज्यसभा सदस्य कुंवर रेवती रमण सिंह की. इलाहाबाद की बराव रियासत से ताल्लुक रखने वाले कुंवर रेवती रमण सिंह समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य हैं.

सन 1989 का दौर था. बोफोर्स तोप में 64 करोड़ के घोटाले की तपिश से देश का सियासी मिजाज़ तप रहा था. राजीव गांधी की मिस्टर क्लीन वाली इमेज तार तार हो गई थी. कांग्रेस के बागी विश्वनाथ प्रताप सिंह कागज़ का एक टुकड़ा लेकर देश भर में घूम रहे थे. घोटाले का सबूत उनके हाथ में था और विपक्षी नेताओं की नब्ज़ भी. ये और बात है कि वीपी सिंह के कागज़ से कभी सबूत का जिन्न नहीं निकला. निकली तो बस दिल्ली की कुर्सी. ख़ैर वो अलग बात है. कांग्रेस से मुक़ाबिल होने के लिए जनता दल बना. नेता बने राजा माण्डा वीपी सिंह. ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तक़दीर है’ का नारा युवाओं के दिल की धड़कन बन चुका था. देश का सियासी माहौल कांग्रेस के खिलाफ़ था. और कांग्रेस चुनाव हार गई. देश के साथ उत्तर प्रदेश भी. दिल्ली में वीपी सिंह की राह में कोई रोड़ा नहीं था. लखनऊ में सियासी पेंच उलझकर रह गया. चरण सिंह की राजनीतिक विरासत को लेकर पुत्र चौधरी अजीत सिंह और एक अन्य दावेदार मुलायम सिंह में संघर्ष चरम पर था. लोकप्रियता में मुलायम सिंह आगे थे तो विधायकों का बहुमत अजीत सिंह के साथ था. कांग्रेसी वंशवाद की सार्वजनिक आलोचना करने वालों में अजीत सिंह की ताजपोशी एक मुश्किल सौदा थी. सियासी रस्साकशी अपने चरम पर थी. बाजी हाथ से निकलता देख अजीत सिंह ने कुंवर रेवती रमण को बुलाया. और कहा कि जो हालात दिख रहे हैं, उसमें मेरा मुख्यमंत्री बन पाना संभव नहीं है. और मैं नहीं चाहता कि मुख्यमंत्री का पद मुलायम सिंह को मिले. मैं चाहता हूं कि मुख्यमंत्री का पद आप सम्हालिये. कुंवर साहब ने चौधरी अजीत सिंह को देखा और बोले कि मुख्यमंत्री का पद मैं नहीं ले सकता. मेरा ईमान मुझे इसकी इजाज़त नहीं देता. मुख्यमंत्री का पद मुलायम सिंह को मिलना चाहिए. मुलायम सिंह ने काफी काम किया है और अब उनको इसका फल देने का समय है.

भौंचक अजीत सिंह ब्रह्मर्षि कुंवर रेवती रमण सिंह को देखते रह गए. कुंवर साहब के इनकार ने मुलायम सिंह के सत्तात्मक क़िरदार की बुनियाद रखी. आज समाजवाद के सैफई राजघराने का जो ग्लैमर और राजनीतिक एप्रोच है, उसकी नींव में कुंवर रेवती रमण सिंह के आदर्श की ईंट भी है. रियासत से सियासत तक कुंवर साहब ने अपने ज़मीर और क़िरदार को कभी गिरने नहीं दिया. अपने क़िरदार की बनावट और बुनावट में लोगों का दुःख दर्द इस कदर समाया कि इलाहाबाद अब प्रयागराज का एक हिस्सा , जो उनसे जुड़ा रहा है, उनको भगवान मानता है. हर शख़्स जो उनके करीब पहुंचा, उनका हो गया. वो उसके हो गए.

हर शख़्स के पास उनकी कहानियां हैं. उनके प्रति सम्मान है. कुंवर साहब 1974 में पहली बात करछना विधानसभा सीट से विधायक चुनकर लखनऊ पहुंचे. उसके बाद कुंवर साहब ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. आठ बार विधानसभा का चुनाव जीतने वाले कुंवर साहब उत्तर प्रदेश में कई बार मंत्री बने. 2004 में पहली बार इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी को धूल चटा दी. 2009 में भी जीत का सेहरा कुंवर साहब ने ही पहना. 2014 की मोदी लहर में कुंवर साहब ने पहली बार चुनावी हार का मुंह देखा. फ़िलहाल कुंवर साहब समाजवादी पार्टी से राज्यसभा के सदस्य हैं. प्रयागराज के नैनी क्षेत्र को औद्योगिक रूप से डेवलप करने के लिए लोग आज भी पूरी इज्ज़त के साथ कुँवर साहब को याद करते हैं.

5 अक्टूबर 1943 को जन्मे कुंवर रेवती रमण सिंह के बारे में एक दिलचस्प तथ्य ये भी है कि वो साधारण पानी नहीं पीते. भारतीय राजनीति में नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने जब अपने पंख फैलाने की कोशिश की तो वो साल 2014 था. महादेव की काशी पहुंचे मोदी ने लोगों से कनेक्ट होने के लिए कहा था, ‘ मैं आया नहीं हूं. मुझे माँ गंगा ने बुलाया है’. वाराणसी अपने इस नए गंगा पुत्र पर रीझ गई, परिणाम आपके सामने है. आज हालात कुछ ऐसे हुए कि गंगा में बहती लाशों के बीच गंगा पुत्र मोदी कहीं नजर नहीं आए. गंगा पुत्र के उनके कमज़ोर होते दावे के बीच आपको कुंवर साहब और माँ गंगा के रिश्ते को जानकर आश्चर्य होगा. देखा जाए तो सही मायनों में कुंवर साहब गंगा पुत्र हैं. माँ गंगा के प्रति अपनी श्रद्धा और अनुराग के चलते कुंवर साहब 38 सालों से सिर्फ गंगाजल पीते हैं. ये आंकड़ा थोड़ा चौंकाता जरूर है, लेकिन सच्चाई यही है कि कुंवर साहब को बयां करने को अब सामान्य पानी का अनुभव भी नहीं रहा. कर्मयोगी, धर्म निष्ठ व्यक्तित्व के तौर पर कुंवर साहब का होना, हमारे दौर की उपलब्धि है. राजनीतिक तौर पर कहूं तो समाजवादी पार्टी के लिए कुंवर रेवती रमण सिंह एक उपलब्धि हैं. पतित होती राजनीति में कुंवर साहब एक नज़ीर हैं. और कभी हम लोग गर्व के साथ कहेंगे कि हमने कुंवर साहब को देखा था. परमात्मा उन्हें शतायु करें.
■डॉ. अम्बरीष राय

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