महसूस करें – मैं कृतज्ञ हूँ, हृदय में विद्यमान दिव्य प्रकाश के लिए
उत्सव, एक अलग अंदाज में’
सुबह के 6 बज रहे थे। मैं अपने बिस्तर पर सोते- सोते ही आने वाली दिवाली की तैयारी के बारे में सोच रहा था। तभी मेरी माँ ने मुझे पुकारा, “मनन! उठो!” मैं अनमना सा उठा और स्कूल के लिए तैयार होने लगा।
दोस्तों, आगे बढ़ने से पहले मैं अपना परिचय देता हूँ। मेरा नाम मनन है, मैं कक्षा 9 में पढ़ता हूँ और यह मेरी कहानी है!
सभी त्योहारों में दिवाली मेरा पसंदीदा त्योहार है। जानते हो क्यों? क्योंकि रोशनी, नए कपड़े, पटाखों, खाने के व्यंजनों और छुट्टियों के कारण यह त्योहार अलग ही होता है।
जब मैं स्कूल जा रहा था, मेरे पापा ने पुकारा, “मनन! क्या तुम आज नए कपड़े खरीदने के लिए चलना चाहते हो ?”
“वाह!!” मैं खुशी से चिल्लाया। “हाँ पापा! मैंने पहले ही तय कर लिया है कि मुझे क्या – क्या खरीदना है।”
उत्साहित महसूस करते हुए, मैं स्कूल बस में चढ़ गया। मैं स्कूल में दिन भर बेचैनी महसूस करता रहा और सोचता रहा, “घंटी कब बजेगी?”
अंत में, स्कूल की छुट्टी हुई और मैं उत्साह के साथ घर आ गया। पापा आज रोज से पहले घर आ गए थे। मैंने उनसे पूछा, “पापा! क्या अब हम बाजार चलें? मैं तैयार हूँ!”
“हाँ बेटा!! चलो चलें!” पापा ने उत्तर दिया।
बाजार में, मैंने अपनी खरीदारी की सूची में से लगभग वह सब कुछ जो मैं चाहता था, एक दुकान से खरीदा और सब कुछ लेकर दुकान से बाहर आ गया।
मैं चमकीले रंग के दीये, रंगीन लाइट और डेकोरेशन वाली बिजली की लड़ियों वाली दुकानों को देख रहा था, तभी अचानक हड़बड़ाहट में मैं एक लड़के से टकराया! मेरा बैग नीचे गिर गया और बैग से सारे कपड़े बाहर निकल कर गिर गए!
मैं कपड़े इकट्ठा करने के लिए झट से झुका। जैसे ही उस लड़के ने मेरे कपड़ों और जूतों को देखा, मैंने उस लड़के के चेहरे पर आश्चर्य और विस्मय के भाव देखे। ऐसा लग रहा था जैसे उसने कभी इतने महंगे कपड़ों को इतने करीब से नहीं देखा हो। वह भी उन कपड़ो को इकट्ठा करने के लिए नीचे झुका।
असुरक्षित महसूस करते हुए, मैंने उससे कपड़े और अपना सामान छीन लिया और जल्दी से वापस अपने बैग में रख लिया।
जब मैं वहाँ खड़ा उसे देख रहा था, मुझे एहसास हुआ कि वो लड़का कुछ अलग था। उसके कपड़े फटे हुए थे; उसके हाथों और पैरों पर चोट के निशान थे और ऐसा लग रहा था जैसे उसने कुछ दिनों से कुछ नहीं खाया हो।
“मनन! जल्दी करो! जाने का समय हो गया है!” मेरे पापा ने मुझे आवाज लगाई। “हाँ! पापा! मैं आ रहा हूँ!”
घर पहुँचने पर, मैंने अपना खाना-पीना किया और खेलने के लिए बाहर चला गया।
उधर खेलते हुए मैंने उसी लड़के को उसके दोस्तों के साथ देखा। मैंने देखा कि उन सभी ने अजीब से फटे कपड़े पहने हुए थे। कुछ एक पल के लिए मेरे दिल ने अच्छा महसूस नहीं किया, पर मैं खेलता रहा। लेकिन, मेरे अंदर अजीब सी हलचल का अहसास पनपने लगा कि मेरे पास इतने सारे कपड़े हैं फिर भी मैं और नए कपड़े ले आया। मेरी अलमारी में कपड़े समा ही नहीं रहे हैं।
मैंने महसूस किया कि मेरा दिल मुझसे कुछ कह रहा था कि “मनन, कृपया इस अहसास को नज़रअंदाज़ मत करो!”
मैं सोचने लगा, “मेरे पास हर चीज के अनेकों विकल्प हैं, कुछ लोगों के पास एक भी विकल्प नहीं होता!” आज जिस लड़के से मैं मिला, उसके बारे में सोचकर ऐसा लग रहा था कि उसकी जीवन की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो रही हैं। मेरी अंतरात्मा मुझसे पूछ रही थी, “क्या तुमको नहीं लगा कि नए कपड़े देखकर उस लड़के को कितनी खुशी हुई? क्या तुम अब भी इन बातों को नज़रअंदाज़ कर सकते हो?”
मेरे पास इतने सारे कपड़े है, जिनका में उपयोग नहीं कर रहा हूँ। मेरे दिल ने कहा कि क्या मैं इनको बेहतर तरीके से उपयोग नहीं कर सकता हूँ।
मैं अपने दादाजी के पास गया और उनको अपने मन की पूरी बात सुनाई। दादाजी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “तुम्हारी बात सुनकर, मुझे एक श्लोक याद आ रहा है :
असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय।”
“इसका क्या मतलब है दादाजी?” मैंने पूछा।
दादाजी ने कहा, “यह ईश्वर से एक तरह की प्रार्थना है – क्या मैं असत्य से सत्य और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ सकता हूँ? दिवाली का त्योहार उन अनुष्ठानों में से एक है जो हमें अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ने के महत्व की याद दिलाता है।”
मैंने फिर पूछा, “हम में यह अंधेरा क्या है?”
“मुख्य रूप से यह हमारी अज्ञानता, हमारा आलस्य, निष्क्रियता और अनभिज्ञता की स्थिति है। हमारे सभी कार्यों और विचारों के प्रति हम जागरूक हो सकते हैं लेकिन क्या हम हमारे दिल में भरे प्यार के बारे में जागरूक हैं?” दादाजी ने उत्तर दिया।
मैं खुद को रोक ना सका और बीच में ही उनसे पूछा, “इस अँधेरे से हम बाहर कैसे आएं?”
दादाजी मुस्कुराए और बोले, “यह तभी हो सकता है जब हमारा दिल प्यार और मोहब्बत से सराबोर हो, इससे हम अपने भीतर कुछ रोशनी ला पाएंगे।”
दादा जी के साथ हुई इस वार्ता से मुझे दिवाली के त्योहार का एक अलग ही महत्व महसूस हुआ। अपने अंदर चल रहे विचारों के साथ मैं पूरी रात सो नहीं सका। अगली सुबह होते ही मैंने दादा जी से कहा, “मैं ये दिवाली अलग तरीके से मनाना चाहता हूँ। मैं उन बच्चों के साथ जिनके माँ-बाप नहीं है, उनके साथ यह त्योहार मनाना चाहता हूँ।”
दादाजी बोले, “बहुत अच्छा, यह तो एक बहुत ही बढ़िया विचार है।” परिवार के सभी सदस्य यह बात सुनकर प्रसन्न हो गए। सबने हैप्पी होम जाने का फैसला किया।
अंत में दिवाली पर मिठाई, कपड़े और उपहार लेकर हम सब वहाँ पहुंचे। जल्द ही, वह स्थान हँसी, आनंद, खुशी और उत्सव से भर गया। मासूम बच्चो मे से कुछ ने गाना गाकर, कुछ ने कहानियाँ और चुटकुले सुना कर हमें आनंदित किया। सब ने बहुत सारे पकवानों का आनंद लिया और सब ने बहुत सारे पटाखे भी जलाए।
तभी उन बच्चों में से एक मेरे पास आया और बोला, “भैया, बहुत-बहुत धन्यवाद! हमने पहले कभी इतना अच्छा महसूस नहीं किया। आपने वास्तव में इस दिवाली को हम सभी के लिए अलग बना दिया है।”
उस बच्चे को सुनकर मेरा मन अंदर से संतुष्ट भी हो गया और भाव विभोर भी। अंततः हमारे जाने का समय हो गया। हमने उन्हें अलविदा कहा, और बहुत जल्द फिर से वापस आने का वादा किया। घर आते वक्त मेरे भीतर एक अजीब सा उत्साह था। ऐसी हालत थी जिसे मैंने उस दिन से पहले कभी भी नहीं महसूस किया था और वह दिवाली मेरी सबसे अलग दिवाली थी।
यह वास्तव में मेरी अब तक मनाई गई सबसे अच्छी दिवाली थी
“जब हृदय प्रेम, कोमलता, दया और करुणा से भर जाता है, तो हम रचनात्मक और सामंजस्य की स्थिति में आ जाते हैं। स्वाभाविक रूप से सम्पूर्ण सृष्टि की भलाई का विचार हमारे अंदर स्वतः ही पनपने लगता है।”
दाजी











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