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जन्माष्टमी व्रत निर्णय

जन्माष्टमी व्रत निर्णय

जन्माष्टमी व्रत निर्णय

प्रथम पक्ष – स्मार्त (वह गृहस्थी जो वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित नही है।) लोग अर्द्धरात्रि व्यापिनी रोहिणी युक्त अष्टमी को व्रत के लिये स्वीकार करते है । यदि रोहिणी प्राप्त न हो तब भी अर्द्धरात्रि व्यापिनी अष्टमी को ही स्वीकार करते हैं। यह श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार युक्तियुक्त भी है ।

द्वितीय पक्ष – जबकि वैष्णव ( वैष्णव सम्प्रदाय में दीक्षित) लोग अर्द्धरात्रि व्यापिनी अष्टमी को छोड़कर नवमी विद्धा अष्टमी एवं उदया तिथि अष्टमी तथा रोहिणी नक्षत्र को ही स्वीकार करते है ।
जन्माष्टमी निर्णय हेतु श्लोक –
निशीथ व्यापिनी ग्राह्या अष्टमी भाद्रकृष्णिका।
नोदयास्ति प्रशस्ता हि
जन्मनि तत्कालसेविता।।
अन्येषूपवासेषु ग्राह्या भाष्करोदया
व्रतमेतत्तिथेरस्ति
नास्ति नाक्षत्रसंज्ञकम् ।।
नच योगस्य करणस्य वारस्यापि व्रतं नहि ।।
तस्मादष्टमीगृह्यात्
सापि ह्युत्सवकालिकाम् ।।
द्वेदिवसेऽर्धरात्रौ यदि कदाचित् स्याच्चाष्टमी
पूर्वाग्राह्या तदा सम्यक् व्रतार्थं स्मार्तभिर्बुधै:।।
अभावे सति निशीथेऽपि
निशीथनिकटां चरेत्।।
(व्रतोपवासनिर्णये वत्स संहितायां)
अर्थात् – भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी निशीथ (रात्रि) काल की ग्राह्य है क्योंकि श्री कृष्ण भगवान का जन्म निशीथ (रात्रि) में हुआ था इसलिए यह तिथि सूर्योदय कालिक प्रशस्त नहीं होती।जबकि अन्य व्रत उपवास में सूर्योदय कालिक तिथि का व्रत करना प्रशस्त होता है।
यह तिथि का व्रत है न तो नक्षत्र का न योग का न दिन का और न ही करण का व्रत इसमें करना चाहिए (अतः संयोग से रोहिणी भी अष्टमी में मिल जाय तो उत्तम है किन्तु इसके लिए परेशान होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह तिथि का अर्थात् अष्टमी तिथि का व्रत है) इसमें अष्टमी तिथि ही ग्रहण करना है और वह भी उत्सव काल की अष्टमी अर्थात् श्रीकृष्ण का जन्मकाल ही उत्सवकाल हुआ अत: मध्य रात्रि में जिस दिन अष्टमी हो उसी दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करना चाहिए।दो अर्द्धरात्रि में यदि अष्टमी प्राप्त हो रही हो तो *जिस रात्रि के मध्य में अष्टमी तिथि प्राप्त हो उसी को व्रत में ग्रहण करना चाहिए परन्तु यदि किसी भी दिन अर्द्ध रात्रि में अष्टमी न हो तो ऐसी स्थिति में अर्ध रात्रि के अत्यंत समीप में जिस दिन अष्टमी हो उसी दिन जन्माष्टमी व्रत करना चाहिए ऐसा ब्रह्मर्षि वत्स का मत है।

निर्णय- उपरोक्त वचनों के आधार पर स्मार्तों के लिये 19 अगस्त शुक्रवार को व्रत रहना श्रेयस्कर होगा क्योंकि इस दिन अष्टमी तिथि रात्रि – 01:06 मि. तक है।
जबकि 18 अगस्त गुरुवार को अष्टमी तिथि रात्रि – 12:14 मि. से लग रही है।अतः अष्टमी तिथि का मध्य रात्रि के आधार पर ही निर्णय होगा ।
(नोट – ऋषिकेश पंचांग एवं महावीर आदि पंचांगों में भी 19 अगस्त शुक्रवार को ही लिखा है)
मध्यरात्रि व्यापिनी होने के कारण स्मार्तों के लिये 19 अगस्त शुक्रवार को एवं वैष्णवों के लिये नवमीविद्धा अष्टमी होने के कारण 20 अगस्त शनिवार को श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी व्रत मान्य होगा।
अब जबकि गोकुल में जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है। उत्सव जन्म होने के बाद ही मनाया जाता है। क्योंकि जन्म का ज्ञान अगले दिन ही गोकुल में हुआ और नन्दोत्सव के नाम से जाना गया ।
अतः अगले दिन उत्सव मनाना उचित ही है। इस भाव को ध्यान में रखते हुये एवं वृंदावन को ही आधार मानकर सभी मंदिरों में उत्सव मनाने का निर्णय किया जाता है। जिससे कि सभी जगह एक ही दिन उत्सव हो ।
अतः जो गृहस्थी व्रत रखना चाहते हैं–वे 19 अगस्त शुक्रवार को व्रत रखें ।
जो मंदिरों में नंदोत्सव मनाते हैं–वे मथुरा के अनुसार 20 अगस्त शनिवार को ही नंदोत्सव मनायें ।
।। सबका मंगल हो ।।
।। आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”।।

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