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अमृतसर गुरूद्वारा जिसे हरमंदर साहिब के नाम से भी जाना जाता है

अमृतसर गुरूद्वारा जिसे हरमंदर साहिब के नाम से भी जाना जाता है

//वाहे गुरू का खालसा, वाहे गुरू की फते//
अमृतसर गुरूद्वारा जिसे हरमंदर साहिब के नाम से भी जाना जाता है। गुरूद्वारे में प्रवेश के लिए भले ही 3 से 4 घंटे की लाईन रहती है, लेकिन प्रवेश के बाद आराम से दर्शन करने की इजाजत दी जाती है। कोई धक्का मुक्की नहीं और किसी प्रकार का अपमान नहीं। सेवादार किसी से ऊंची आवाज या अपमान जनक भाषा में हटने के लिए नहीं कहते हैं। जिन माताओं की गोद में बच्चे रहते हैं अथवा लाचार बुजुर्ग उन्हें उसी प्रवेश द्वार से प्रवेश दिया जाता है जहां से दर्शन के लिए भीड़ भरी लाईन शुरू होती है, लेकिन उन्हें भीड़ रास्ता दे देती है और वे हरमंदर साहिब में पहले प्रवेश कर दर्शन कर लेते हैं। बस यही यहां की वीआईपी व्यवस्था है। कतार में खड़े श्रद्धालुओं के लिए 20-20 मीटर पर पेयजल की व्यवस्था है ठंडा और मीठा पानी स्टील की प्याली में पिलाया जाता है। जूते चप्पल रखने के लिए जूता घर पूरी तरह निःशुल्क और वातानुकूलित है। उसी जूता घर के नीचे अमानतीय सामान घर पूरी तरह निःशुल्क वातानुकूलित है। यहां पर अपना सामान सामान सुरक्षित रख कर टोकन प्राप्त किया जाता है। 24 घंटे चलने वाला अखंड लंगर बहुत ही साफ सूथरा और प्रेम से भोजन कराने का स्थान है। एक एक थाली में आराम से भोजन परोसा जाता है। मैंने एक अन्य स्थान (जो सिख धर्म से संबंधित नहीं है) ऐसा भी देखा है जहां श्रद्धालुओं की थाली में “अपने को श्रेष्ठ कहने वाले दक्षिण भारतीय मनुष्य द्वारा” बगैर झुके ऊपर से पटक कर रोटी दी जाती है। गुरूद्वारे के आस पास ठहरने के लिए संत निवास बने हैं। ये निवास किसी पंचसितारा होटल से कम नहीं लेकिन इसमें ठहरने की राशि मात्र 200 रुपए प्रतिदिन है। रेलवे स्टेशन से स्वर्ण मंदिर पहुंचने के लिए आटो से 20 रुपए प्रति यात्री किराया है। देश भर से चलने वाली 6 ट्रेन ऐसी है जिनका अंतिम स्टापेज अमृतसर ही है। इसके अलावा दिल्ली से जम्मूतवी जाने वाली सभी ट्रेनों का स्टापेज अमृतसर है। औसत लगभग 6000 यात्री अमृतसर स्टेशन पर उतरते हैं। लेकिन होटल और आटो रिक्शा के दाम बढाए नहीं जाते। एक विशेषता और है स्वर्ण मंदिर परिसर में पुलिस व्यवस्था नहीं है पूरी व्यवस्था स्वर्ण मंदिर के सेवादार ही करते हैं

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