विरह एवं दुःख एक अलौकिक विलक्षणता है
विरह एवं दुःख एक अति विलक्षण योग है।
यह एक विष की घूँट है,नीम का चबाना है,कुनैन का फाँकना है।परन्तु हाय रे ! यह विष कितना मधुर है ! कितना सरस है ! कितना अमरत्व रखता है !
विरह –
विरह एक अलौकिक विलक्षणता है,जो शीश पर सवार होकर बोलता है।
विरह एक ऐसा नशा है जो नेत्रों द्वारा दूसरे के हृदय में प्रवेश कर जाता है।
दुःख –
दुःख भी स्वर्ण को तपा कर चमकाने वाली एक भट्टी है जो मनुष्य को तपाकर समस्त पाप,ताप,संताप मिटाकर सुख एवं शांति प्रदान करता है एवं मानव को निर्मल बना देता है।
विरह एवं दुःख परमात्मा की एक देन है जो किसी विशिष्ट कृपापात्र पर ही उतरती अथवा प्राप्त होती है।
वह ईश्वर जिस पर विशेष प्रसन्न होता है उसी को विरह एवं दुःख रूपी पुरुस्कार प्रदान करता है।
इसलिए किसी ने पूछा –
जिसपर तुम हो रीझते क्या देते यदुवीर।
तो भगवान जी ने कहा –
रोना धोना सिसकना आहों की जागीर।
आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”












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