Jan Media TV

Inform Engage Inspire

Advertisement

एक प्रश्न…… ऐसी परिस्थिति में गुप्ता जी की जगह अगर हम होते तो क्या करते?

एक प्रश्न…… ऐसी परिस्थिति में गुप्ता जी की जगह अगर हम होते तो क्या करते?

एक प्रश्न…… ऐसी परिस्थिति में गुप्ता जी की जगह अगर हम होते तो क्या करते?

फ़र्क तो पड़ता है

दौड़ते-भागते गुप्ता जी जैसे ही ऑफिस पहुँचे, दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उन्हें बताया- “सर ने आपको आते ही मिलने के लिए कहा है।”

डरते-डरते जैसे ही वे कैबिन के अंदर गए, डायरेक्टर साहब एकदम से बरस पड़े, ”गुप्ता जी, इससे पहले कि आप एक नई कहानी सुनाएँ, मैं आपको स्पष्ट कह देता हूँ कि आप आज आराम करिए। छुट्टी की अर्जी दीजिए और जितनी समाज सेवा करनी है, कीजिए। तंग आ चुका हूँ मैं आपकी परोपकार कथा सुन-सुनकर। क्या फ़र्क पड़ता है आपकी समाजसेवा से? क्या समाज बदल गया? यदि नौकरी करनी है तो ढंग से कीजिए।”

गुप्ता जी डायरेक्टर साहब के आदेशानुसार उस दिन की छुट्टी की अर्जी देकर ऑफिस से बाहर आकर सोचने लगे, “अभी से घर जाकर क्या कर लूँगा। क्यों न अस्पताल जाकर उस बच्चे की हालत पता कर लूँ, जिसे ऑफिस आते समय सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त पड़ा देखा था। उसे अस्पताल पहुँचाने के चक्कर में ऑफिस पहुँचने में देर तो हो ही गई, और साहब की डाँट भी खा ली। तो उसे ही जाकर देख लेता हूं, शायद अब तक उस बच्चे को होश भी आ गया हो।”

अनायास ही गुप्ता जी के कदम अस्पताल की ओर चल पड़े। जैसे ही वह अस्पताल पहुँचे, डॉक्टर ने उन्हें बताया कि बच्चे को होश आ गया है और उसके मम्मी-पापा भी आ चुके हैं।

“आइए आपको बच्चे के माता पिता से मिलवाता हूँ….इनसे मिलिए, गुप्ता जी, जिन्होंने आज सुबह आपके बच्चे को यहाँ भर्ती कराया। यदि समय पर यह बच्चे को यहाँ नहीं लाते और अपना रक्त दान नहीं किया होता तो कुछ भी हो सकता था।”

“सर आप…? ये आपका बेटा…?”
सामने डायरेक्टर साहब थे, हाथ जोड़कर खड़े। काटो तो खून नहीं। कुछ भी बोल पाने की स्थति में नहीं थे।

बस भरे नेत्रों से इतना ही कह पाए, “गुप्ता जी, फ़र्क तो बहुत पड़ता है परोपकारिता से!”

दोस्तों हमारे द्वारा किये गये परोपकार से शायद समाज तो नहीं बदल सकता, पर एक के दिल को भी परिवर्तित कर दिया तो जीवन सार्थक हो जाएगा!

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थ मिदं शरीरम् ॥

भावार्थ :
परोपकार के लिए वृक्ष फल देते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए ही बहती हैं और गाय परोपकार के लिए दूध देती है, अर्थात् यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।

“सेवा करते समय अगर सेवा करने का खयाल बना रहे तो असलियत हासिल नहीं हो सकती। ये तो तभी हासिल होती है जब सेवा करते समय इसे करने का अहसास तक न हो।”
बाबूजी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *