अवधी हमारी माटी की बोली,इसके लोकरंग को सहेजे कवि कलाकारःबेशरम
करछना।अवधी में हमारे घर,आंगन,परंम्परा,संस्कृति,
संस्कार,व्यवहार,दिनचर्या के इन्द्र धनुषी रंग समाहित है।यह मीठी बोली हमें पुरखों से मिली जो घर आंगन खेत सिवानों में हमेशा गूंजती रही।आज खड़ी बोली की चकाचौंध में अपनी इस स्थानीय बोली की मिठास,सहजता और लोकरंग सहेजने के लिए कवि, कलाकार, साहित्यकारों को आगे आने की जरूरत है।यह बातें अखिल भारतीय अवधी समाज के प्रयागराज मण्ड़ल संयोजक,आकाशवाणी दूरदर्शन के ग्रामीण कार्यक्रमों के प्रस्तोता और चर्चित हास्य कवि अशोक बेशरम ने लोक मंगल संस्थान रामपुर में बुधवार को आयोजित एक गोष्ठी के दौरान कही।उन्होनें कहा कि हालीवुड़ बालीवुड के मंच से अलग आज भोजपुरी का नाट्य मंच तैयार हो चुका है।बघेली बोली,ब्रजभाषा,बुंदेलखंड़ी जैसी बोलियों में भी स्थानीय लोक कलाकारों और कवियों द्वारा इसे ऊंचाई प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है।ऐसी स्थिति में अवधप्रान्त कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के एक बड़े भू भाग में रची बसी अपनी अवधी बोली को नाट्य मंचों,रंगमंचों,कविताओं और लोक साहित्य सृजन के माध्यम से बचाने और आगे बढाने की जरूरत है।मण्डल अध्यक्ष कवि संतोष शुक्ल समर्थ ने कहा कि अवधी विरासत और हमारी पहचान है।अपनी इस बोली के गीत संगीत लोकाचारआज भी जनमानस में लोकप्रिय हैं।हमारे सभी लोक कलाकारों को चाहिए कि अवधी भाषा के गीतों का लेखन और प्रस्तुतियों के माध्यम से इसे अधिक से अधिक लोगों में विस्तारित करें।साहित्यकारों ने कहा कि मौसम के साथ अपनी इस भाषा के विस्तार और सर्जना के लिए कवियों साहित्यकारों को भी आगे आने की जरूरत है।जिससे हम अपनी इस पहचान को सहेजते हुए अवधी के अस्तित्व को बरकरार रख सकें।अध्यक्षता अवधी के वरिष्ठ कवि रामलोचन सांवरियां और संचालन गीतकार राजेन्द्र शुक्ल ने किया। इस मौके पर क्षेत्रीय समाजसेवी,कवि,कलाकार और प्रवुद्धजन मौजूद रहे।













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