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चाक्षुष्मती विद्या

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चाक्षुष्मती विद्या

एक बार भगवन संगकृति आदित्यलोक गए ! वहां सूर्य देव को प्रणाम करके उन्होंने चाक्षुष्मती विद्या द्वारा उनकी स्तुति की!
चक्षु इन्द्रिय के प्रकाशक भगवन श्री सूर्य नारायण को प्रणाम !
आकाश में विचरण करने वाले भगवन श्री सूर्य नारायण को प्रणाम !
महासेन (सहस्त्रों किरणो की सेना ) वाले भगवन श्री सूर्य नारायण को प्रणाम !
तमोगुण रूप में भगवन श्री सूर्य नारायण को प्रणाम !
रजोगुण रूप में भगवन श्री सूर्य नारायण को प्रणाम !
सत्वगुण रूप में भगवन श्री सूर्य नारायण को प्रणाम !
हे भगवन श्री सूर्य नारायण ! आप मुझे असत से सत की ओर ले चलिए !
हे भगवन श्री सूर्य नारायण ! आप मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए !
हे भगवन श्री सूर्य नारायण ! आप मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिए !
भगवन हे भगवन श्री सूर्य नारायण ! आप शुचि रूप है और अप्रतिरूप है ! आपके रू की कहीं भी तुलना नहीं है !
जो अखिल रूपों को धारण कर रहे है तथा रश्मि मालाओं से मंडित है !
उन जातवेदा सर्वज्ञ अग्निस्वरूप स्वर्णसादृश्य प्रकाश वाले ज्योतिस्वरूप और तपने वाले भगवन श्री सूर्य नारायण को हम स्मरण करते है !
ये सहस्त्र किरणों वाले तथा शत २ प्रकार से सुशोभित भगवन श्री सूर्य नारायण समस्त प्राणियों के समक्ष भलाई के लिए उदित हो रहे !
जो हमारे नेत्रों के आदित्य प्रकाश है उन अतिनन्दन भगवन श्री सूर्य नारायण को प्रणाम है !
दिन का भार वहन करने वाले विश्व वाहक भगवन श्री सूर्य नारायण हमारा सब कुछ समर्पित है !

इस प्रकार चाक्षुष्मती विद्या द्वारा स्तुति किये जाने पर भगवन श्री सूर्य नारायण प्रसन्न होकर बोले – जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है , उसे आँख का रोग नहीं होता! उसके कुल में कोई अँधा नहीं होता ! ८ ब्राहम्णो को इसका ग्रहण करा देने पर इसकी सिद्धि हो जाती है !

विनियोग

ॐ अस्याश्चाक्क्षुषी विद्यायाः अहिर्बुधन्य ऋषिः। गायत्री छंद। सूर्यो देवता। चक्षुरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः।

भावार्थ – ॐ इस चाक्षुषी विद्या के ऋषि अहिर्बुधन्य हैं। गायत्री छंद है। सूर्यनारायण देवता है। नेत्ररोग की निवृत्ति के लिए इसका जप किया जाता है। यही इसका विनियोग है।

मंत्र इस प्रकार से है
〰〰〰〰〰〰
ॐ चक्षुः चक्षुः तेज स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरित चक्षुरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय। यथा अहं अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय। कल्याणं कुरु करु।
याति मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूल्य निर्मूलय। ॐ नम: चक्षुस्तेजोरत्रे दिव्व्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकराय अमृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमः भगवते सूर्यायाक्षि तेजसे नमः।खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मा सद गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवांछुचिरूपः। हंसो भगवान शुचिरप्रति-प्रतिरूप:।ये इमां चाक्षुष्मती विद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति।
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा विद्या-सिद्धिर्भवति। ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा।

भावार्थ – ॐ हे सूर्यदेव ! आप मेरे नेत्रों में नेत्रतेज के रूप में स्थिर हों। आप मेरा रक्षण करो, रक्षण करो। शीघ्र मेरे नेत्ररोग का नाश करो, नाश करो। मुझे आपका स्वर्ण जैसा तेज दिखा दो, दिखा दो। मैं अन्धा न होऊँ, इस प्रकार का उपाय करो, उपाय करो। मेरा कल्याण करो, कल्याण करो। मेरी नेत्र-दृष्टि के आड़े आने वाले मेरे पूर्वजन्मों के सर्व पापों को नष्ट करो, नष्ट करो।

ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले, दिव्यस्वरूप भगवान भास्कर को नमस्कार है। ॐ करुणा करने वाले अमृतस्वरूप को नमस्कार है। ॐ भगवान सूर्य को नमस्कार है। ॐ नेत्रों का प्रकाश होने वाले भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है। ॐ आकाश में विहार करने वाले भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है। ॐ रजोगुणरूप सूर्यदेव को नमस्कार है। अन्धकार को अपने अन्दर समा लेने वाले तमोगुण के आश्रयभूत सूर्यदेव को मेरा नमस्कार है।

हे भगवान ! आप मुझे असत्य की ओर से सत्य की ओर ले चलो। अन्धकार की ओर से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु की ओर से अमृत की ओर ले चलो।

उष्णस्वरूप भगवान सूर्य शुचिस्वरूप हैं। हंसस्वरूप भगवान सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं। उनके तेजोमय रूप की समानता करने वाला दूसरा कोई नहीं है।

जो कोई इस चाक्षुष्मती विद्या का नित्य पाठ करता है उसको नेत्ररोग नहीं होते हैं, उसके कुल में कोई अन्धा नहीं होता है। आठ ब्राह्मणों को इस विद्या का दान करने पर यह विद्या सिद्ध हो जाती है।

विनियोग मंत्र : ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुधन्य ऋषिः गायत्री छन्दः सूर्यो देवता चक्षुरोगनिवृत्तये विनियोगः।
अब इस चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र का पाठ आरम्भ करें :-
ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरितम् चक्षुरोगान शमय शमय। मम जातरूपम् तेजो दर्शय दर्शय। यथाहम अन्धो न स्यां कल्पय कल्पय। कल्याणम कुरु कुरु। यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानी चक्षुः प्रतिरोधकदुष्क्रतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः। खेचराय नमः। महते नमः। रजसे नमः। तमसे नमः। असतो मां सदगमय। तमसो मां ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः। हंसो भगवान शुचिरप्रतिरूपः। य इमां चक्षुष्मतिविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुल अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।

#source #bhavishyapuran

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