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अखिलेश यादव का संकेत- AAP यहां आए किसलिए

अखिलेश यादव का संकेत- AAP यहां आए किसलिए…
उत्तर प्रदेश में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी लड़ाई के बीच कुछ नए खिलाडी अपनी जगह बनाने की जुगत में भिड़े हैं. सत्ताधारी बीजेपी के सामने चूंकि सपा ही सीधे लड़ाई में दिखती है, लिहाजा उसके साथ जाने को लोग आतुर हैं. सपा ने तमाम छोटे-छोटे दलों के साथ समझौते कर लिए हैं और कई कतार में भी हैं. ऐसा ही एक दल है आम आदमी पार्टी जो यूपी में साइकिल की सवारी कर अपना खाता यूपी में खोलना चाहती थी, लेकिन अखिलेश उसे भी हाथ नहीं रखने दे रहे हैं. राज की बात ये है कि अखिलेश को मनाने की आखिरी कोशिश तो आप कर रही है, लेकिन ये गठबंधन नहीं हुआ तो आप शायद ही यूपी के चुनावी समर में दिखाई दे.

आप को सपा अपने साथ नहीं सटने दे रही है, ये बात अब सामने भी आ गई है. हालत ये है कि आप को यूपी के प्रभारी महासचिव संजय सिंह के कई बार कोशिश करने के बावजूद अखिलेश बातचीत के लिए उपलब्ध तक नहीं हो रहे हैं. लिहाजा, आप ने भी अब सपा पर दबाव बनाने के लिए कांग्रेस वाला खेल खेलने की कोशिश शुरू की है. वो खेल ये कि ज्यादा सक्रियता दिखाकर किसी भी तरह यूपी में जिन सीटों पर सपा बहुत कमजोर रही है, उनमें छह-सात सीटों पर भी बात बन जाए तो वह गठबंधन के लिए मान जाएगी. यहां दीगर है कि सपा अध्यक्ष को आप ने ऐसी 30 सीटों की सूची सौंपी थी जो पिछले चार-पांच बार से सपा कभी नहीं जीती और पिछले चुनावों में चौथे या तीसरे नंबर पर रही है.राज की बात ये है कि अखिलेश यादव ने सूची तो ले ली थी, लेकिन आप के इस प्रस्ताव पर बिल्कुल भी राजी नहीं हैं. यहां पर भी सपा अध्यक्ष की सीधी सोच है कि इससे सपा को कोई फायदा नहीं होगा. बीजेपी विरोधी लोगों से अखिलेश ने मिलने में तो कोई कंजूसी नहीं बरती, लेकिन गठबंधन और सीटों के बंटवारे में वह फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं. यूपी में कोई ऐसा खिलाड़ी वो नहीं लाने देना चाहते जो बीजेपी के खिलाफ सबसे बड़ा चेहरे के तौर पर अखिलेश दिख रहे हैं, उसका ग्लैमर कोई बांट सके. अखिलेश के इस रुख ने यूपी में बेहद आशावादी हो रहे संजय सिंह को अजीब स्थिति में फंसा दिया है.

यूपी के मुद्दों पर संजय सिंह चाहे अयोध्या में जमीन का मुद्दा हो या अन्य मसले, उस पर बात तो कर रहे थे, लेकिन वो कहीं भी राज्य की सियासत में अभी प्रभाव डालने में असफल रहे हैं. यहां तक कि अयोध्या आरती करने भी अरविंद केजरीवाल पहुंच गए, लेकिन सरयू के तट पर उन्हें ये आभास हो गया कि यूपी में झाड़ू तितर-बितर हो जाएगी. राज की बात ये है कि जिस तरह से यूपी के सर्वेक्षण आ रहे हैं, उसके बाद आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यूपी में चुनाव में न लड़ने का फैसला कर लिया था.

राज की बात ये भी कि चुनाव लड़ने को आतुर संजय सिंह से साफ कह दिया है केजरीवाल ने कि अगर सपा से गठबंधन हो तो ही चुनाव में जाना है. कारण है कि किसी भी सर्वे में सीट जीतना तो दूर वोट प्रतिशत के मामले में भी आप की बहुत बुरी हालत है. इसीलिए, संजय सिंह ने अब अखिलेश पर दबाव बनाने के लिए 2 जनवरी को लखनऊ में बड़ी रैली करने की तैयारी की है. इसमें शक्ति प्रदर्शन कर सपा अध्यक्ष को चंद सीटों के लिए झुकाने की कोशिश की जाएगी, लेकिन कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी पहले धरना-प्रदर्शन से माहौल बनाने की कोशिश की थी, लेकिन अखिलेश ने उन्हें घुसने नहीं दिया. जाहिर है ऐसे में आप का यूपी में चुनाव लड़ना ही अभी मुश्किल दिख रहा है.

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