” हृदय का विस्तार *
“हृदय” एक ऐसी चीज़ है जैसे किसी तालाब में कोई चीज़ दबी पड़ी हो, जिसका पता न हो, किन्तु हो ज़रूर ! माँस का लोथड़ा वास्तव में आध्यात्मिक दृष्टि से “हृदय” नहीं कहा जा सकता । हाँ, यह तालाब ज़रूर है, जिस में दिल गुम है, इसकी खोज उसी समय होती है, जब उस गुम, खोई हुई, चीज़ में बढ़ाव प्रारम्भ हो जाता है। यह चीज़ उस माँस के लोथडे की सीमा और बंधन से आज़ाद है, किन्तु ठिकाना उसी में है। रुहानी मन्ज़िल में वास्तव में यही बीज है जो अन्ततोगत्वा पेड़ बना है, और उसी के फल से तृप्ति होती है । उसकी आँख हर दिशा में फैल जाती है, यहाँ तक कि प्रत्येक चक्र को ढक लेती है और अपना असर उसमें कायम कर देती है । यह वह चीज़ है कि यदि यह कहा जाये कि प्रकृति ने उसे अपने आप बनाया है, तो ठीक होगा। यह वह चीज़ है जो प्रकृति के गर्भ में पली है। इसके शुद्ध रूप में वही शक्ति का आधार कह सकते हैं । यह वह दाना है कि जब अस्तित्व की खेती जल जाती है तो यह उगता है। इस की प्रशंसा कहाँ तक की जावे । यह चीज़ बढ़ते-बढ़ते समस्त ब्रह्माण्ड (Cosmos) में पहुँच जाती है । और उसमें ऐसी लय हो जाती है कि अपने अस्तित्व को पूर्ण रूपेण नष्ट किये बिना ही यहाँ तक बढ़ती है कि अन्तिम सीमा पर पहुँचा देती है। यह वह सीढ़ी है कि जिस पर हम चढ़ते चले जाते हैं और अन्त में जहाँ तक अभ्यासी की पहुँच सम्भव है, पहुँच जाते हैं ।
- श्रद्धेय श्री बाबूजी महाराज












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