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उत्तर प्रदेश चुनाव2022: क्यों आलाकमान पर अपनों को ज्यादा टिकट दिलाने का दबाव बढ़ा रहा मौर्य खेमा

उत्तर प्रदेश चुनाव2022: क्यों आलाकमान पर अपनों को ज्यादा टिकट दिलाने का दबाव बढ़ा रहा मौर्य खेमा

उत्तर प्रदेश भाजपा में ‘योगीआदित्यनाथ बनाम केशव प्रसाद मौर्य’ विवाद भले ही खत्म मान लिया गया हो, पर्दे के पीछे दोनों दिग्गज नेताओं में रस्साकसी अभी भी जारी है। चुनाव बाद कीपरिस्थितियों के लिए दोनों खेमे पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूरे कामकाज के बीच बेहद सधे हुए अंदाज में पार्टी अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह के जरिए पार्टी पर भी पकड़ बनाए हुए हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते टिकट वितरण के दौरान भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रहने वाली है। वहीं, उपमुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्या भी टिकट बंटवारे में अपनों को ज्यादा से ज्यादा टिकट दिलाने की जुगत भिड़ा रहे हैं ताकि चुनाव बाद की विशेष परिस्थिति में अपने लिए मजबूत भूमिका की दावेदारी पेश की जा सके।

‘60 फीसदी हमारा है, बाकी में बंटवारा है’
दो दिन पहले उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद ने यूपी के ‘मौर्य समाज’ के एक कार्यक्रम को संबोधित किया। इसमें मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा जातियों के लोग भारी संख्या में उपस्थित थे। उपमुख्यमंत्री ने इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए टिकट बंटवारे में इशारों-इशारों में अपने समाज की महत्त्वपूर्ण भागीदारी की मांग की। ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसको उतनी हिस्सेदारी’ की तर्ज पर उपमुख्यमंत्री ने पिछड़े समाज के लोगों के लिए टिकटों में ज्यादा हिस्सेदारी की मांग की। मंच से ‘60 फीसदी हमारा है, बाकी में बंटवारा है’ की नारेबाजी भी की गई।

केशव प्रसाद मौर्य का यह भाषण केवल लोगों को उत्साहित करने के लिए दिया गया बयान मात्र नहीं था। बताया जा रहा है कि वे विधानसभा टिकट बंटवारे में अपने लोगों की ज्यादा भागीदारी तय करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। गोरखपुर जोन को छोड़कर बाकी पूर्वांचल और अवध क्षेत्र के ज्यादा से ज्यादा सीटों पर मौर्या अपने लोगों को ज्यादा टिकट दिलाने की कोशिशों में जुटे हैं।मौर्य खेमे के एक नेता के मुताबिक पार्टी ने केशव प्रसाद की क्षमता का अब तक बेहद शानदार तरीके से उपयोग किया है। इससे पार्टी का प्रदेश में विस्तार हुआ है और प्रदेश में 2017 में सरकार बनाने में सफलता हासिल हुई है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि सही समय पर पार्टी उन्हें केंद्रीय भूमिका में लाकर उन्हें ज्यादा प्रभावी भूमिका में लाने का काम करेगी।   

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक अब यह विवाद पुराना हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह अपनी रैलियों में योगी आदित्यनाथ को पार्टी के चेहरे के तौर पर प्रचारित कर रहे हैं। अमित शाह का यह बयान कि नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ को दोबारा मुख्यमंत्री बनाया जाना आवश्यक है, साबित कर देता है कि बदले माहौल में अब यूपी में योगी आदित्यनाथ का कोई विकल्प नहीं है। आरएसएस से उन्हें मिल रहा समर्थन उन्हें अपरिहार्य के तौर पर पेश कर रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे में इस बात की कोई आशंका नहीं रह गई है कि चुनाव बाद पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा।    

वहीं, मौर्य समर्थक नेता का मानना है कि यदि किसी कारण से चुनाव में पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाता है तो चुनाव बाद एक सर्वसम्मत चेहरे के तौर पर केशव प्रसाद मौर्य पार्टी के लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं। ऐसी किसी परिस्थिति में पार्टी के विधायकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है, लिहाजा उसके लिए अभी से गुणा-भाग जारी है। यही कारण है कि टिकट बंटवारे की प्रक्रिया में पार्टी नेतृत्व के पास अपने खेमे के ज्यादा से ज्यादा नाम भेजने की कोशिश हो रही है।

केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका होगी निर्णायक

हालांकि, भाजपा में केवल नाम भेजने से किसी खेमे विशेष की दावेदारी मजबूत नहीं होती। भाजपा में टिकट बंटवारे की एक बेहद स्पष्ट और (पार्टी के स्तर पर) बेहद पारदर्शी प्रक्रिया है। पार्टी का संसदीय बोर्ड किसी सीट पर उम्मीदवारों के नाम पर अंतिम मुहर लगाता है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संगठन मंत्री बीएल संतोष, गृहमंत्री अमित शाह सहित पार्टी के संसदीय बोर्ड के सभी सदस्य शामिल होते हैं। जिस राज्य के टिकटों का वितरण होना होता है, उस राज्य के मुख्यमंत्री (यदि वहां पार्टी सत्ता में है तो) और प्रदेश अध्यक्ष को भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है।

उत्तर प्रदेश भाजपा के एक प्रवक्ता के मुताबिक, टिकट वितरण के समय पार्टी कई समीकरणों को ध्यान में रखती है। सामाजिक समीकरण, क्षेत्रीय समीकरण, विपक्षी दलों के उम्मीदवार और उसकी रणनीति पर गहन चर्चा होती है। इसके बाद ही पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व किसी नाम पर अंतिम मुहर लगाता है। उत्तर प्रदेश का चुनाव कई मायनों में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी महत्वपूर्ण होने वाले हैं, केंद्रीय नेतृत्व बेहद उपयुक्त उम्मीदवार को ही मैदान में उतरने की अनुमति देगा। भाजपा पार्टी में इस स्तर पर खेमेबाजी नहीं चल सकती

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