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जानें व्रत या उपवास कितने प्रकार के होते हैं?तथा धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व को।

जानें व्रत या उपवास कितने प्रकार के होते हैं?तथा धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व को।

व्रत रखने का नियम दुनिया को सनातन धर्म ने सिखाया।व्रत रखना एक पवित्र कर्म है और यदि इसे नियम पूर्वक नहीं किया जाता है इसका कोई महत्व नहीं होता है और न ही लाभ अपितु इससे नुकसान भी हो सकता है। यदि आप व्रत बिल्कुल भी नहीं रखते हैं तो भी आपको कष्ट भुगताना पड़ेगा।
व्रतों के प्रकार – व्रत तो मूलत: तीन प्रकार का होता है – 1 – नित्य, 2 – नैमित्तिक, 3 – काम्य।

1 – नित्य व्रत उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और परनिंदा न करना, प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन न करने से मनुष्य दोषी माना जाता है।
2 – नैमिक्तिक व्रत उसे कहते हैं जिसमें किसी प्रकार के पाप हो जाने या दुखों से छुटकारा पाने का विधान होता है। अन्य किसी प्रकार के निमित्त के उपस्थित होने पर चांद्रायण,तिथि,आदि विशेष में जो ऐसे व्रत किए जाते हैं वे नैमिक्तिक व्रत कहे जाते हैं।
3 – काम्य व्रत किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाता है जैसे पुत्र प्राप्ति के लिए, धन- समृद्धि के लिए या अन्य सुखों की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला व्रत काम्य व्रत कहा जाता है।
व्रतों का वार्षिक चक्र –
1- साप्ताहिक व्रत – सप्ताह में एक दिन व्रत रखना चाहिए। यह सबसे उत्तम है।
2 – पाक्षिक व्रत – 15 – 15 दिन के दो पक्ष होते हैं कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक पक्ष में चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या और पूर्णिमा के व्रत महतवपूर्ण होते हैं। उक्त में से किसी भी एक व्रत को करना चाहिए।
3 – त्रैमासिक – वैसे त्रैमासिक व्रतों में प्रमुख है नवरात्रि के व्रत। सनातन धर्म अनुसार माघ, चैत्र, आषाढ और अश्विन मास में नवरात्रि आती है। उक्त प्रत्येक माह की प्रतिपदा यानी एकम् से नवमी तक का समय नवरात्रि का होता है। इन नौ दिनों तक व्रत और उपवास रखने से सभी तरह के क्लेश समाप्त हो जाते हैं।
4 – छह मासिक व्रत – चैत्र माह की नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि दोंनों के बीच छह माह का अंतर होता है इसमें भी व्रत करना चाहिए।
5 – वार्षिक व्रत – वार्षिक व्रतों में पूरे श्रावण मास में व्रत रखने का विधान है। इसके अलवा जो लोग चतुर्मास करते हैं उन्हें जिंदगी में किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता है। इससे यह सिद्ध हुआ की व्रतों में ‘श्रावण माह’ महत्वपूर्ण होता है। सोमवार नहीं पूरे श्रावण माह में व्रत रखने से हर तरह के शारीरिक और मानसिक कलेश मिट जाते हैं।

उपवास के प्रकार – कुल 13 प्रकार के उपवास बताये गये हैं –
1 – प्रात: उपवास, 2 – अद्धोपवास, 3 – एकाहारोपवास, 4 – रसोपवास, 5 – फलोपवास, 6 – दुग्धोपवास, 7 – तक्रोपवास, 8 – पूर्णोपवास, 9 – साप्ताहिक उपवास, 10 – लघु उपवास, 11 – कठोर उपवास, 12 – टूटे उपवास, 13 – दीर्घ उपवास।
1 – प्रात: उपवास – इस उपवास में सिर्फ सुबह का नाश्ता नहीं करना होता है और पूरे दिन और रात में सिर्फ 2 बार ही भोजन करना होता है।
2 – अद्धोपवास – इस उपवास को शाम का उपवास भी कहा जाता है और इस उपवास में सिर्फ पूरे दिन में एक ही बार भोजन करना होता है। इस उपवास के दौरान रात का भोजन नहीं किया जाता।
3 – एकाहारोपवास – एकाहारोपवास में एक समय भोजन में सिर्फ एक ही अन्न एक ही चीज खाई जाती है।
4 – रसोपवास – इस उपवास में अन्न तथा फल जैसे ज्यादा भारी पदार्थ नहीं खाए जाते सिर्फ रसदार फलों के रस अथवा साग-सब्जियों के जूस पर ही रहा जाता है। दूध पीना भी मना होता है क्योंकि दूध की गणना भी ठोस पदार्थों में की जाती है।
5 – फलोपवास – कुछ दिनों तक सिर्फ रसदार फलों या शाक आदि पर रहना फलोपवास कहलाता है। अगर फल बिलकुल ही अनुकूल न पड़ते हो तो सिर्फ पकी हुई साग-सब्जियां खानी चाहिए।
6 – दुग्धोपवास – दुग्धोपवास को ‘दुग्ध कल्प’ के नाम से भी जाना जाता है। इस उपवास में कुछ दिनों तक मात्र दूध ही पीना होता है।
7 – तक्रोपवास – तक्रोपवास को ‘मठ्ठाकल्प’ भी कहा जाता है। इस उपवास में जो मठ्ठा लिया जाए उसमें घी कम होना चाहिए और वो खट्टा भी कम ही होना चाहिए तथा पतला होना चाहिेए।
8 – पूर्णोपवास – इस व्रत में मात्र ताजा एवं निर्मल जल (पानी)के अलावा किसी और चीज को बिलकुल न खाना पूर्णोपवास कहलाता है।
9 – साप्ताहिक उपवास – पूरे सप्ताह में सिर्फ एक पूर्णोपवास नियम से करना साप्ताहिक उपवास कहलाता है।
10 – लघु उपवास – 3 से लेकर 7 दिनों तक के पूर्णोपवास को लघु उपवास कहते हैं।
11 – कठोर उपवास – इस उपवास में पूर्णोपवास के सारे नियमों को सख्ती से निभाना पड़ता है।
12 – टूटे उपवास – इस उपवास में 2 से 7 दिनों तक पूर्णोपवास करने के बाद कुछ दिनों तक हल्के प्राकृतिक भोजन पर रहकर दोबारा उतने ही दिनों का उपवास करना होता है। उपवास रखने का और हल्का भोजन करने का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि इस उपवास को करने का मकसद पूरा न हो जाए।
13 – दीर्घ उपवास – दीर्घ उपवास में पूर्णोपवास बहुत दिनों तक करना होता है जिसके लिए कोई निश्चित समय पहले से ही निर्धारित नहीं होता। इसमें 21 से लेकर 50-60 दिन भी लग सकते हैं। अक्सर यह उपवास तभी तोड़ा जाता है जब स्वाभाविक भूख लगने लगती है अथवा शरीर के सारे जहरीले पदार्थ पचने के बाद जब शरीर के जरूरी अवयवों के पचने की नौबत आ जाने की संभावना हो जाती है।

व्रत के वैज्ञानिक महत्व –
हमारे धर्म,शास्त्र,व्रत में वैज्ञानिकता है।
व्रत करने से हमारी पाचन क्रिया, पाचनशक्ति अच्छी रहती है।पाचनतंत्र अच्छे से कार्य करता है।व्रत – उपवास करने से रोगों का भी शमन होता है तथा शरीर स्वस्थ एवं निर्मल रहता है। चेहरे पर तेज,मन प्रसन्न,और आयु की वृद्धि होती है। आयुर्वेद में व्रत की महत्ता को बहुत ही सुन्दर दर्शाया गया है।
अतः प्रत्येक मनुष्य को सप्ताह में एक बार व्रत अवश्य करना चाहिए।

आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”
(ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र एवं वैदिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ)
संपर्क सूत्र – 09956629515
0318757871

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