मत कर तू मनमानी बदरा |
ठीक नहीं नादानी बदरा |
देख जरा तू हुई शर्म से,
धरती पानी पानी बदरा |
दो दिन पहले भी आया था ,
साथ हवाएँ भी लाया था |
इक चादर की जाड़ अभी है,
भीगी हुई किवाड़ अभी है |
चौबारे में सिमटी बूढ़ी
काँप रही है नानी बदरा |
मत कर तू मनमानी बदरा |
ठीक नहीं नादानी बदरा………
नदियाँ अभी उफान ले रहीं |
लोग डरे हैं, जान ले रहीं |
फसलें लोट गयी हैं सारी |
आनी है पकने की बारी |
कल से ही स्कूल खुले हैं ,
घुटने तक था पानी बदरा |
मत कर तू मनमानी बदरा |
ठीक नहीं नादानी बदरा…….
अब त्योहारों का सीजन है |
भक्ति रंग में रंगा जन है |
सुन्दर कल मूरत ले आया |
बड़ी खूबसूरत ले आया |
पंडालों में गूँज रहा है,
जय जय अम्बेरानी बदरा
मत कर तू मनमानी बदरा |
ठीक नहीं नादानी बदरा |
बिजली ठीक नही कुछ दिन से,
परसों बात हुई मुस्किल से |
हाल ठीक से पूछ न पाया |
मन ही मन खीझा चिल्लाया |
अब ना जाने कब सुलझेगी,
उलझी प्रेम कहानी बदरा |
मत कर तू मनमानी बदरा |
ठीक नहीं नादानी बदरा |
देख जरा तू हुई शर्म से,
धरती पानी पानी बदरा |
—सन्तोष शुक्ल ‘समर्थ’
प्रयागराज
9598650907











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