कुशोत्पाटनी अमावस्या:-
गृहस्थाश्रम में हमेशा सभी दैविक एवं पितरों के कार्यो में कुश की आवश्यकता होती है जैसे उपनयन संस्कार-विवाह संस्कार कोई भी यज्ञ में कुशकण्डिका एवं पवित्री इत्यादि कुश से ही संपन्न होता है।
वह कुशा कब ग्रहण करना चाहिए और किस मंत्र से निकालना चाहिए –
भाद्रपद मास के अमावस्या तिथि को कुश
निकालने से वह कुश एक वर्ष तक शुद्ध
रहता है।
कुश को जड़ सहित निकालना चाहिए एवं कुश की
लम्बाई प्रादेश मात्र (अंगूष्ठा से तर्जनी
अंगुली-पर्यंत) ही होना चाहिए। पूर्व या
उत्तर दिशा मुँह करके कुश निकलना चाहिये।
कुश निकालने की विधि और मन्त्र:-
ॐ विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठीनिसर्गजः।
दह्स्व सर्वपापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव॥
(इस मंत्र से कुश का स्पर्श करें।)
ॐ कुशमूले स्थितो ब्रह्मा कुश मध्ये जनार्दनः।
कुषाग्रे शंकरं विद्यात्कुषान् मे देहि मोदिनि॥
(इस मंत्र से भूमि और कुश का स्पर्श करें।)
ॐ कुषोसि कुष्पुत्रोसि ब्रह्मणा निम्मिर्तः पुरा।
देव पितृ हितार्थाय कुषमुत्पाटयाम्यहम्॥
(इस से जड़ सहित कुश निकालना चाहिए।)
तंत्रकेमत् केवल “ॐ हुँ फट्” उच्चारण करते हुए कुश निकालें॥
✍️जय वैद्यनाथ
🙏तीर्थपुरोहित
वैद्यनाथ धाम, देवघर











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