ध्यान से पढ़िए—
युवा पीढ़ी में संस्कारों की कमी, जिम्मेदार कौन?
आचार्य धीरज द्विवेदी”याज्ञिक”
आज की युवा पीढ़ी में संस्कारों की कमी , और भटकाव के कारण कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में हम स्वयं ही हैं !हमने हमारी आवश्यकताएं ही इतनी ज्यादा असीमित कर ली, की फिर चाहे उसके लिए हमें कुछ भी करना पड़े ! पैसा गाड़ी बंगला झूठी शान और शोहरत के लिए दिखावा ही जैसे हमारे लिए संस्कार बन गए हों! हम सोचते हैं कि हमने हमारे युवाओं को अच्छी शिक्षा खान पान रहन सहन सभी सुख सुविधाएं दी है ! और हर किसी मां बाप में अपने बच्चों को लेकर यह होड़ लगी है ! कि हम हमारे बच्चों के लिए सब कुछ सुख सुविधाएं कर दें ! और हम रात दिन इसी भागदौड़ में समय निकाल देते हैं ! बजाय बच्चों के साथ समय व्यतीत करने के ? और वही हम सबसे बड़ी गलती करते हैं ! खानपान गलत और पहनावा अर्धनग्न कटा फटा ही शान हो गया ! गाय की सेवा को पिछड़ापन समझकर कुत्तों की सेवा में ही अपनी शान समझना जबकि हमारे भारतवर्ष में कुत्ते बिल्लियों से दिल बहलाने की कभी किसी को जरूरत ही नहीं थी हमारा घरौंदा तो प्यार प्रेम सदाचार शिष्टाचार अपनापन त्याग से बनता रहा है ! जहां सभी परिवार सुख और दुख में सदा साथ रहे हैं ! और सदा ही एक दूसरे के प्रति वफादार रहे हैं ! यह दिखावा चमक दमक आडंबर बेवफाई तो पाश्चात्य संस्कृति रही है ! जिससे वह लोग परेशान होकर कुत्ते बिल्लियों से दिल बहलाते आए हैं ! फिर हम क्यों ?लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि जब तक हम स्वयं छल कपट दिखावा और आडंबरों की दुनिया से बाहर नहीं निकलेंगे , तब तक युवाओं को अच्छे संस्कारों में कैसे हम ढाल सकते हैं ! इसका कारण हमें तब पता चलता है ! जब युवा हमारे हाथ से निकल जाते हैं !और हम कुछ नहीं कर पाते ।
आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”
ग्राम व पोस्ट खखैचा प्रतापपुर हंडिया प्रयागराज उत्तर प्रदेश।












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