जैविक तरीके से हानिकारक कीटों का नियंत्रण कैसे करें?
तम्बाकू
निकोटीन लगभग तम्बाकू की 15 किस्मों से मिलता है. तम्बाकू की पत्तियों का पाउडर बनाकर पानी में घोलकर इसका उपयोग किया जाता है. ये कीट के शरीर में प्रवेश करके उसके तंत्रिका तन्त्र को प्रभावित करता है, जिससे कीट को लकवा मार जाता है और कुछ समय बाद कीट की मृत्यु हो जाती है. इनका प्रयोग माहू कीट के नियंत्रण के लिये किया जाता है.
पायरेथ्रम
यह मुख्यतः गुलदाउदी के फूल से तैयार किया जाता है. इसका प्रयोग करने से तुरन्त ही अपना शक्तिशाली प्रभाव दिखाता है. यह मुख्यत पायरेथ्रम का स्राव तथा क्ले मिट्टी के पाउडर के मिश्रण से बना होता है, इसे डस्ट, फुहार तथा ऐरोसोल के रूप में प्रयोग करते हैं. रेटिनॉल
यह मुख्यत पान लता की जड़ों से तैयार किया जाता है. जिसका सामान्यत उपयोग मछली विष और पत्ती खाने वाली सूंडी के लिये किया जाता है. इसकी पीसी हुई जड़ों के एक भाग के पाउडर और क्ले पाउडर तथा जिप्सम के 5 भाग के साथ मिलाकर तैयार किया जाता है.
रिसिनॉल
यह अरण्डी की पत्तियों से तैयार किया जाता है जो कि कोडलिंग मोथ के लार्वा के विरूद्ध उपयोग में लाया जाता है.
नीम का उपयोग
नीम के बीज और नीम सीड करनेल एक्सट्रेक्ट का प्रयोग मुख्यतः काटने व चबाने वाले कीटों को नियंत्रण करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है. नीम की 10 से 12 किलोग्राम पत्तियों को 200 लीटर पानी में 4 दिन तक भिगोकर रखें. पानी हरा पीला होने पर उसे छानकर 1 एकड़ की फसल में छिड़काव करने से इल्ली की रोकथाम की जा सकती है.
मिर्च या लहसुन
500 ग्राम हरी मिर्च व 500 ग्राम लहसुन को पीसकर चटनी बनाकर पानी में घोल बनाते हैं फिर इसे छानकर 100 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने से कीटों का नियंत्रण होता है.
ट्रेप क्रॉप
इससे मुख्य फसल को कीट के आक्रमण से बचाया जा सके उसके लिये जैसे एक पंक्ति में गेंदा तथा 16 पंक्ति में टमाटर के पौधे लगाते हैं, जिससे कीट गेंदे पर आते हैं, टमाटर पर नहीं आते है.











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