गुरु ज्ञान के उजाले में शिष्यों ने मिटाया अंतस का अंधेरा
गुरु कुम्हार सिष कुंभ है गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट/आंतर हाथ सहार दै बाहर बाहै चोट…। चाक पर घड़े को संवारने वाले कुम्हार से गुरु की तुलना करने वाली संत कबीर की यह पंक्तियां शनिवार को गुरु पूर्णिमा महोत्सव पर साकार हुईं। कोरोना संक्रमण की वजह से कर्फ्यू के बावजूद शिष्यों ने गुरु पीठों पर हाजिरी लगाई और मन के अंधकार को दूर करने के लिए गुरु ज्ञान को आत्मसात किया। शहर के मठों, आश्रमों में इस बार गुरु पूर्णिमा पर उत्सव जैसा माहौल रहा। गुरुओं ने शिष्यों को दीक्षा प्रदान की।गुरु पूर्णिमा पर संगम समेत गंगा के तटों पर स्नान, ध्यान के साथ ही दान-पुण्य का सिलसिला दिन भर चला। श्रद्धालुओं ने त्रिवेणी संगम के तट पर पूर्णिमा पर पुण्य की डुबकी लगाई। इस दौरान मठों, आश्रमों में गुरु पूजा-वंदना के लिए शिष्यों का जमावड़ा लगा रहा। कला, संगीत के गुरुओं के यहां भी शिष्यों ने हाजिरी लगाई और आशीर्वाद लिया। अल्लापुर स्थित मठ बाघंबरी गद्दी में सुबह सविधि मंत्रोच्चार के साथ गुरु पूजन किया गया। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और मठ के महंत नरेंद्र गिरि का शिष्यों ने पादुका पूजन किया।
गुरु ज्ञान के उजाले में शिष्यों ने मिटाया अंतस का अंधेरा












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