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नेपाल में तबाही के बाद चीन पर सवाल! क्या भारत पर भी मंडरा रहा हिमालयी खतरा?

नेपाल में महाविनाशकारी बाढ़: हिमालय, चीन और भारत पर बढ़ता खतरा | ग्लेशियर, GLOF और Early Warning का सवाल

जनमीडिया टीवी मनोज कुमार सिंह।
दोस्तों, आप सभी को रक्षाबंधन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। आज का यह प्रश्नकाल उस हाहाकारी मानवीय त्रासदी पर आधारित है जिसका सामना हमारा पड़ोसी राष्ट्र नेपाल पिछले तीन दिनों से लगातार कर रहा है। पिछले बुधवार को हिमालय के नेपाल-तिब्बत सीमा वाले इलाके में ग्लेशियर के महाकाय बड़े हिस्से के टूटने से गत बुधवार नेपाल के रसुआ जिले अचानक महा विनाशकारी भयानक बाढ़ आ गई जिससे जन धन और सम्पत्ति की भारी तबाही हुई है।


नेपाल और तमाम अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के आकलन के अनुसार इस आपदा में कम से कम 270 लोगों की मौत हुई है। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि 1,500 से ज़्यादा लोग लापता हैं जिनमें भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा समेत दो दर्जन देशों के 579 पर्यटक शामिल हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस आपदा में 288 भारतीय लापता हैं जबकि प्रभावित इलाके से 21 लोगों को सुरक्षित बचाया गया है। कम से कम 19 मोटर योग्य पुल और 40 किलोमीटर से अधिक सड़कें पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुईं या बह गई हैं।
नेपाल और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र को जोड़ने वाला बेत्रावती से रसुवागढ़ी सीमा तक का मुख्य मार्ग कई स्थानों पर तबाह हो गया है। नेपाल और तिब्बत सीमा के पास लगभग 12 से 13 हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स और बांधों को भारी नुकसान पहुंचा है।
साथियों, इस समय जब यह प्रश्नकाल चल रहा है तो लगभग तीन घंटे पहले ही यह खबर भी आ चुकी है कि हिमालय से लगे चीन के सिनचुआन प्रांत में रिक्टर स्केल पर 6 दशमलव 3 तीव्रता का भूकम्प आया और उसके बाद कई ऑफ्टर शाक भी आए। इसके चलते हिमालय में सुप्राग्लेशियल झील का बंध आज एक बार फिर टूट गया है, जिससे भारी मात्रा में बाढ़ का पानी एक बार फिर नीचे की ओर चल पड़ा है। नेपाल से यह खबर भी आ चुकी है कि बतौर एहतियात रसुआ जिले को खाली कराया जा रहा है। तीन दिनों के अंदर दूसरी बार आ रही इस बाढ़ का असर कब, कहां और कितना होगा, यह आकलन इस समय किया जा रहा है।
लेकिन, गत बुधवार की आपदा बहुत भयानक थी। सुबह ठीक 8 बजकर 37 मिनट पर हिमालय में ग्लेशियर का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूटकर नेपाल के लांगटांग नेशनल पार्क की घाटी में गिरा। यह जगह नेपाल की राजधानी काठमांडू से लगभग 60 किलोमीटर उत्तर में, नेपाल-तिब्बत पहाड़ी सीमा के पास स्थित है।
इस घटना की तीव्रता इतनी ज़्यादा थी कि शुरू में इसे रिक्टर स्केल पर 4.4 तीव्रता का भूकंप समझा गया। बाद में यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे ने पता लगाया कि यह भू-कंपन ग्लेशियर की चट्टानों और बर्फ के गिरने से हुआ था और इसकी तीव्रता रिक्टर स्स्केल पर 5.2 मापी गई। इस आपदा से पानी, कीचड़, चट्टान और बर्फ का एक विशाल सैलाब उमड़ पड़ा, जो घाटियों से होता हुआ ज़ोरदार आवाज़ के साथ लेन्डे खोला, भोटे कोशी और त्रिशूली नदियों में बहने लगा।
तेज़ रफ़्तार से अचानक आई इस भयानक बाढ़ का पानी उत्तरी नेपाल के कस्बों की ओर तेज़ी से बढ़ा, जिनमें पर्वतारोहण करने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के बीच लोकप्रिय इलाके भी शामिल थे।
नेपाल और तिब्बत को जोड़ने वाली गियिरोंग बॉर्डर पोस्ट के डरावने वीडियो में लोगों को अपनी जान बचाने के लिए भागते हुए देखा गया, जबकि मलबे की दीवार ने इमारतों को नष्ट कर दिया और बसों की कतारों को बहा ले गई। घर और सड़कें कुछ ही सेकंड में बह गए।
जलप्रलय की घातक शक्ति के स्पष्ट उदाहरण में, एक वीडियो में त्रिशूली नदी को पर बने एक पुल को सुनामी जैसी बाढ़ में बहते हुए दिखाया गया था। नदी के किनारे के शहर से होकर बहने वाली तेज धारा के कारण बहु-मंजिले घर तेजी से जलमग्न हो गए।
दरअसल, इतनी तेज गति से चलने वाली मिट्टी और पानी “तरल कंक्रीट की तरह” एक ऐसा घातक संयोजन बनाते हैं कि उसमें आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
नेपाल के पर्यटन मंत्रालय के अनुसार सबसे अधिक प्रभावित जिलों में से एक रसुवा में आपदा आने से पहले सैकड़ों लोग ट्रैकिंग कर रहे थे। अधिकारियों ने बताया कि भारत और प्रवासी भारतीयों के 133 पर्यटक लापता हैं, जो तिब्बत में हिंदुओं के पवित्र स्थल कैलाश पर्वत की तीर्थयात्रा पर गए थे।
बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने और नदी का जलस्तर सामान्य से अधिक होने के कारण बुधवार को बचाव अभियान मुश्किल था। नेपाल के प्रभावित क्षेत्र स्याप्रु बेसी और तिमुरे के रसुवा क्षेत्र में हेलीकॉप्टर नहीं उतर सके, जिनकी आबादी करीब 50 हजार है।
बाढ़ के पानी में बहुमंजिला इमारतों की निचली मंजिलें दब जाने के बाद बचावकर्मी कीचड़ और कीचड़ से होकर जीवित बचे लोगों की तलाश कर रहे थे।
इंग्लैंड की नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी के पृथ्वी वैज्ञानिक डेव पेटली ने घटना के पैमाने को “सर्वनाश” के करीब करार दिया है। पानी की विशाल मात्रा संभवतः बर्फ का एक संयोजन थी जो प्रारंभिक पतन और नदी के जल में गिरने के परिणामस्वरूप पानी में परिवर्तित हो गई।
चंडीगढ़ स्थित डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट आर्गेनाईजेशन की संस्था डिफेंस जियो इनफॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट के पूर्व डायरेक्टर डॉक्टर अश्वघोष गंजू कहते हैं कि नेपाल में आई तबाही कमजोर हो चुके ग्लेशियर के टूटने और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) प्रमुख कारण लग रही है।
उनका कहना है कि हजारों साल पुराने ग्लेशियर बदलते हुए तापमान और ग्लोबल वार्मिंग के चलते एक साल में आधा से एक फिट तक आगे बढ़ रहे हैं।
कई बार यह सत्रह से बीस हजार फीट की ऊंचाई पर आगे खिसकते खिसकते एक ढलान में आ जाते हैं, जिनको हैंगिंग ग्लेशियर कहते हैं और यही खतरनाक हो जाते हैं।
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व वैज्ञानिक डॉक्टर रत्नाकर सेनगुप्ता के अनुसार, हिमालयन रीजन के ग्लेशियर लाखों टन वजनी बर्फ का भार नहीं झेल पा रहे हैं। ज्यादातर ग्लेशियर या तो फ्रेक्चर्ड हैं या फिर हैंगिंग पोजीशन में आ चुके हैं। इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है।
नेपाल के पत्रकारों के एक समूह ‘नेपाल कॉरेस्पोंडेंस’ ने इस तबाही के लिए शिनझिआंग-तिब्बत क्षेत्रों में उसके बेलगाम निर्माण कार्यों को जिम्मेदार ठहराया है। इन पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि चीन-नेपाल सीमा पर ऊंचाई वाले ग्लेशियर क्षेत्रों में चीन ने सीमा पर अपने ‘श्याओकांग मॉडल’ वाले गांव और बस्तियां बसा दी हैं।
तिब्बत के केरुंग शहर में चीन ने पहाड़ियों को बेदर्दी से काटा है और त्रिशूली नदी के प्राकृतिक बहाव को ही बदल दिया है। पर्यावरणीय दृष्टि से अतिसंवेदनशील हिमालयी इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचने की वजह से अब चीन-नेपाल सीमा पर हर साल भयानक हिमस्खलन आ रहे हैं, जिससे फ्लैश फ्लड का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
नेपाली पत्रकार परशुराम काफले ने एक्स पर पोस्ट करके ड्रैगन की नीयत पर सवाल उठाया। काफले ने लिखा, ‘नेपाल हमेशा अपने पड़ोसियों की सुरक्षा चिंताओं का ध्यान रखता है। लेकिन, चीन ने अर्ली अलर्ट न देकर नेपाल को धोखा दिया है। काफले ने लिखा है कि चीन की सीमा से अक्सर ऐसे संकट आते रहते हैं।’
दोस्तों, इस आपदा को लेकर न केवल नेपाल और चीन बल्कि भारत भी उनमे शामिल है, तीनों देशों के सामने कई तरह के प्रश्न खड़े हो गए हैं जिनकी पड़ताल बहुत जरूरी है।
इस आपदा से निकला पहला प्रश्न तो यही है कि क्या नेपाल को समय रहते चेतावनी दी जा सकती थी? नेपाल में यह प्रश्न तेजी से उठ रहा है कि तिब्बत में उत्पन्न खतरे की सूचना नेपाल तक समय रहते क्यों नहीं पहुंची।
नेपाली मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ सीमा पार कर जाने के लगभग 16 मिनट बाद नेपाल के जल-विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग को इसकी सूचना मिली। अर्थात समस्या केवल नेपाल की घरेलू चेतावनी प्रणाली की नहीं, बल्कि सीमापार सूचना-साझेदारी की भी है।
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। अभी उपलब्ध सार्वजनिक प्रमाणों के आधार पर यह निर्णायक रूप से कहना जल्दबाजी होगी कि चीन ने जानबूझकर चेतावनी रोकी।
ग्लेशियर का अचानक टूटना और उससे पैदा हुई मलबा-बाढ़ अत्यंत तीव्र घटना हो सकती है, जिसमें चेतावनी का समय बहुत कम हो। इसलिए जांच का सही प्रश्न यह होना चाहिए—
क्या चीन के पास ऐसा पूर्व-संकेत, जल-स्तर अथवा सेटेलाइट और हाइड्रोलॉजिकल डेटा उपलब्ध था जिसे नेपाल को समय पर साझा किया जा सकता था?
यह प्रश्न तथ्यात्मक जांच का विषय है, आरोप का पूर्व-निर्णय नहीं।
इस महा विनाशकारी बाढ़ के पर्यावरणीय आयाम पर विचार करें तो यह प्रश्न सबसे गंभीर है कि क्या हिमालय अस्थिर हो रहा है? यह वो सवाल है जो पृथ्वी की परिस्थितिकी और अंततः पूरी मानवता के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट को रेखांकित करता है।
इस आपदा का सबसे बड़ा दीर्घकालीन सबक हिमालय में बदलते जलवायु-जोखिम से जुड़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ता तापमान ग्लेशियरों, हिम-संचयों और पर्वतीय ढलानों को अस्थिर कर रहा है। परिणामस्वरूप ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़, हिमस्खलन, भूस्खलन और अचानक मलबा-बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है।
यह कोई अकेली घटना भी नहीं है। जुलाई 2025 में तिब्बत की एक सुप्राग्लेशियल झील के फटने से भटकोशी क्षेत्र में कम-से-कम नौ लोगों की मृत्यु हुई थी और चीन–नेपाल मित्रता सेतु को नुकसान पहुंचा था।
वर्ष 2024 के एक वैज्ञानिक अध्ययन ने भी तिब्बत से आने वाली इस तरह की भयानक बाढ़ के संदर्भ में नेपाल की भाटकोशे और त्रिशुली घाटियों को संवेदनशील पाया था तथा सीमापार अर्ली वार्निंग सिस्टम और सहयोग को जोखिम घटाने के लिए आवश्यक बताया था।
अतः अब साफ है कि हिमालय को केवल जल-संसाधन या पर्यटन क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि साझे और तेजी से बदलते इकोलाजिकल रिस्क जोन के रूप में देखा जाना चाहिए।
नेपाल के सामने चीन से संबंधित कुछ स्वाभाविक लेकिन कठिन प्रश्न हैं – मसलन क्या तिब्बत में ग्लेशियरों, झीलों और ऊपरी नदी-प्रवाह की रीयल टाइम मानिटरिंग हो रही थी? क्या उस निगरानी से चीन को कोई पूर्व-संकेत मिला था?
क्या ऐसे आंकड़े नेपाल के साथ नियमित रूप से साझा किए जाते हैं?
यदि कोई चेतावनी उपलब्ध थी, तो नेपाल को वह किस समय और किस माध्यम से भेजी गई? क्या दोनों देशों के बीच ट्रांसबाउंड्री डिजास्टर वार्निंग प्रोटोकाल पर्याप्तस्पष्ट और बाध्यकारी है? भविष्य में चीन और नेपाल संयुक्त रूप से सेटेलाइट, हाइड्रोलाजिकल और भूकम्प संबंधी आंकड़े साझा करने की व्यवस्था कैसे बनाएंगे?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि ऊपरी नदी-क्षेत्र पर चीन का नियंत्रण और निचले प्रवाह पर नेपाल की निर्भरता एक स्वाभाविक असमानता पैदा करता है। जलवायु परिवर्तन इस असमानता को सुरक्षा और विदेश नीति का विषय बना देता है।
नेपाल–चीन संबंधों में सड़क, व्यापार, ऊर्जा और सीमा जैसे मुद्दों के साथ अब पर्यावरणीय कूटनीति और आपदा राजनय को भी महत्वपूर्ण स्थान देना होगा।
2025 की बाढ़ के बाद भी यह स्पष्ट हुआ था कि तिब्बती क्षेत्र में होने वाली हिमनदीय घटनाएं सीधे नेपाली आबादी और बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए नेपाल को चीन से केवल बाढ़ आने के बाद राहत नहीं, बल्कि पूर्व-आपदा डेटा और चेतावनी की संस्थागत व्यवस्था मांगनी चाहिए। इसके लिए दोनों देशों के बीच एक स्थायी मेकेनिज्म बनाया जा सकता है, जिसमें –
वास्तविक समय में नदी-प्रवाह डेटा साझा हो।
उच्च-जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की संयुक्त निगरानी हो।
सेटेलाइट इमेजरी और रिमोट सेंसिंग डेटा साझा किए जाए।
सीमा के दोनों ओर आटोमेटिक सायरन और एसएमएस चेतावनी प्रणाली हो।
संयुक्त डिजास्टर रिसपांस एक्सरसाइज हों।
और किसी भी आपात स्थिति में सूचना देने की स्पष्ट समय-सीमा तय हो।
यहां राजनयिक संवेदनशीलता महत्वपूर्ण है। नेपाल के लिए चीन पर सीधे दोषारोपण करना कठिन होगा, क्योंकि प्राकृतिक आपदा अत्यंत अचानक आई और स्वयं चीन का तिब्बती क्षेत्र भी प्रभावित हुआ। चीन में भी मौतें और बड़ी संख्या में लोग लापता हुए हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि प्राकृतिक आपदा का हवाला देकर सूचना-साझेदारी के प्रश्न को छोड़ दिया जाए।
नेपाल को एक स्वतंत्र, वैज्ञानिक और द्विपक्षीय जांच की मांग करनी चाहिए—जिसका उद्देश्य किसी देश को दोषी ठहराना नहीं बल्कि यह निर्धारित करना हो कि कौन-सा डेटा उपलब्ध था, कब उपलब्ध था और किसे कब भेजा गया।
इस घटना का प्रभाव नेपाल और चीन तक सीमित नहीं है। हिमालयी नदियों का प्रवाह आगे भारत में आता है, इसलिए ऐसी अचानक बाढ़ भविष्य में भारतीय हिमालय और बिहार जैसे डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए भी खतरा बन सकती है। इसीलिए, भारत के लिए भी नेपाल और चीन के साथ बहुपक्षीय हिमालयी अर्ली वार्निंग आर्किटेक्चर का निर्माण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। मौजूदा घटना के बाद भारत में भी डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए जोखिम की चेतावनी दी गई है।
इससे एक व्यापक विचार सामने आता है—हिमालय को राजनीतिक सीमाओं से नहीं, एक साझा पर्यावरणीय प्रणाली के रूप में देखना होगा।
नेपाल की वर्तमान त्रासदी तीन परस्पर जुड़े संकटों को उजागर करती है—जलवायु परिवर्तन, सीमापार आपदा-जोखिम और सूचना-कूटनीति।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर चीन द्वारा जानबूझकर अर्ली वार्निंग न देने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। लेकिन, यह पूछना पूरी तरह उचित है कि क्या पर्याप्त पूर्व-सूचना उपलब्ध थी और यदि थी, तो वह नेपाल तक समय पर क्यों नहीं पहुंची। नेपाली रिपोर्टों में सूचना बाढ़ के सीमा पार करने के बाद मिलने की बात सामने आई है, जो मौजूदा सीमापार चेतावनी व्यवस्था की गंभीर कमजोरी दिखाती है।
अतः इस आपदा से नेपाल को चीन के साथ संबंधों में टकराव नहीं, बल्कि अधिक पारदर्शिता, बाध्यकारी डेटा-साझेदारी और संयुक्त हिमालयी आपदा-प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। दीर्घकाल में हिमालयी देशों के बीच जलवायु और आपदा सहयोग को उसी स्तर की प्राथमिकता देनी होगी जिस स्तर पर आज सीमा, व्यापार और सुरक्षा को दी जाती है।
आज के प्रश्नकाल का समापन भी हम इस प्रश्न के साथ कर रहे हैं विकास के नाम पर विनाश की अंधी दौड़ कब तक चलती रहेगी। आखिर कब तक आदमी अपने स्वार्थ के लिए धरती पर्यावरण का नाश करता रहेगा।
साथियों, आप भी इन सवालों पर सोचिएगा। यदि कोई विचार आए तो कमेंट सेशन में लिखिएगा।

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