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भगत सिंह का क्रान्ति से अभिप्राय हर प्रकार के शोषण से मुक्ति था, चाहे सरकार में गोरे हों या कोई स्वदेशी सरकार।

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भगत सिंह का क्रान्ति से अभिप्राय हर प्रकार के शोषण से मुक्ति था, चाहे सरकार में गोरे हों या कोई स्वदेशी सरकार।

भगत सिंह कम्युनिस्ट थे। भगत सिंह नास्तिक थे। भगत सिंह अपने अंतिम समय में लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। ये सब बातें लगभग हर इंसान जानता है, और अधिकतर साथी भगत सिंह को पढ़कर ये भी जान चुके है की वो ऐसे क्यों थे।

अर्नेस्टो चेगुवारा के जब अपनी डाक्टरी की पढ़ाई पूरी किया तो वो एक मोटरसाइकिल पर पूरे दक्षिणी अमेरिका के टूर पर निकल पड़े।
उन्होंने पूरे महादीप की गरीबी को अपने आँखों से देखा।
उन्ही दिनों अर्जेंटीना और बोलिविया में एक महामारी फैली, जिससे लाखो लोग संक्रमित हो गए। डाक्टरों ने उस महामारी की वैक्सीन भी खोज निकाली। और फिर इलाज करने वालों में युवा अर्नेस्टो चेगुवारा भी लग गए।
लेकिन कई साल इलाज करने के बाद भी “चे” ने ये नोटिस किया की संक्रमितों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है, रोज नए मरीज बढ़ते ही चले जा रहे हैं।
इसका मूल कारण जब उन्होंने खोजा तो उन्हें पता चला की – असल में समस्या वो महामारी नहीं है, असली प्रॉब्लम है की लोगो के रहने वाली मलिन बस्तिया और उनका पोषण इतना खराब है की ये बीमारी कम हो ही नहीं सकती।
फिर एक अध्यन के बाद उन्होंने समझा की समस्या की जड़ वो व्यवस्था है जो की इन लाखों लोगो को इन रुग्ण जीवन परिस्तिथियों से बाहर नहीं निकलने दे रही।
और गहन अध्यन के बाद उन्हें पता चला की असल में ये ये परिस्तिथियाँ स्वाभाविक नहीं है, वरन एक साजिश के तहत एक वर्ग सिर्फ अपने फायदे के लिए उत्पादन, राजनीति और अर्थव्यवस्था को अपने हिसाब से हांककर ऐसी परिस्तिथियाँ पैदा कर देता है की समाज के एक बड़े वर्ग को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

इसी तरह क्रान्ति के सन्दर्भ में जो दर्शन भगत सिंह ने दिया था उसे समझना बहुत जरुरी है।
क्रान्ति या क्रांतिकारी का दर्शन वाकई कोई अमिता-बच्चन की फिल्मो की तरह नहीं होता की उसके निजी जीवन में कोई बहुत बड़ा अत्याचार हुआ हो, उसकी नौकरी चली गयी हो या उसके किसी बाप भाई को वर्ग शत्रु की पुलिस ने मार दिया हो तो वो इस सिस्टम से तंग आकर क्रान्ति करने को निकल पड़ा हो।
वर्गों में विभाजित समाज में स्पष्ट रूप से हर व्यक्ति किसी ना किसी रूप में शोषित होता है।
तो क्रांतिकारी होने का मतलब सिर्फ इस समाज में सताया होना पूर्ण क्वालिफिकेशन नहीं है।

किसी भी समाज में सांस्कृतिक आर्थिक और शोशल ढाँचे को बदलने के लिए असल में मानव समाज के विज्ञान और इस व्यवस्था को समझना सबसे जरुरी है।
इसके बिना समझे यदि आप अपने पर हुए अत्याचार की खुन्दक में आकर व्यवस्था का विरोध करतें है तो सौ प्रतिशत चांस है की आप अपने किसी स्वार्थ एक पूरा होते ही अपनी विचारधारा बदल लोगे। किसी मुसहर या दलित बस्ती में जाकर सेवा करने, या छत से पुलिस के ऊपर पत्थर फेंकने से समाज को बदलने का दर्शन फलीभूत नहीं होता।

इसलिए किसी भी संघर्ष से पहले ये समझना सबसे जरुरी है की अतीत और वर्तमान समाज में वर्गों का विभाजन किस फैशन में हुआ करता है।
यदि आप आज भी कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा, राजद, शिवसेना, सीपीएम, सीपीआई आदि पार्टियों के सन्दर्भ में रखकर राजनितिक परिवर्तन की सोचेंगे तो अंततः वही हाथ लगेगा जो आज हम झेल रहे हैं।
वर्तमान सरकार आज कुछ भी ऐसा नया नहीं कर रही है जो की कांग्रेस ने शुरू नहीं किया था। फर्क सिर्फ इतना है की वर्तमान सत्ता के पास इस लुटेरी योजनाओ के लागू करने के बाद उपजे जनाक्रोश को भटकाने की स्किल कांग्रेस से ज्यादा है। जब ये लोग इस आक्रोश को तितर-बितर करने में फेल हो जाएंगे तो सेफ्टी वाल्व के तौर पर वही दल सत्ता में आ जाएगा जिसने ये सब शुरू किया था।

इसलिए भगत सिंह का दर्शन का सार सरल रूप में यही है की –
हम इस लड़ाई को कांग्रेस बीजेपी शिव सेना सीपीआई आदि दलों की राजनितिक लड़ाई के रूप में ना देंखें।
ये लड़ाई वर्ग संघर्ष की लड़ाई है, ये लड़ाई सीधे सीधे सत्ता ( सभी राजनितिक दल) और जनता के बीच है। क्योंकि असल विपक्ष जनता है।
वरना आज जैसे भक्त लोग बीजेपी, कांग्रेस….. की हर आर्थिक निति के समर्थन में बहानेबाजी और उसे जस्टिफाई करते नज़र आतें हैं, उसी प्रकार अगले सत्ता परिवर्तन के बाद आपको भी ऐसे ही बहाने बनाने पड़ेंगे।
भगत सिंह का क्रान्ति से अभिप्राय हर प्रकार के शोषण से मुक्ति था, चाहे सरकार में गोरे हों या कोई स्वदेशी सरकार।

पोस्ट जनचेतना ग्रुप से साभार

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