क्या हम वास्तव में कभी अकेले होते हैं?
गोपाला
बंगाल के घने जंगल में, गोपाला और उनकी माँ गाँव के बाहरी इलाके में एक छोटी-सी मिट्टी की झोपड़ी में रहते थे। गोपाला जब छोटा था, तभी उसके पिता की मृत्यु हो गई थी। गोपाला और उनकी माँ अकेले रहते थे। वे ग्रामीणों द्वारा प्रदान किये गए छोटे से खेत में खेती करके अपना गुजर बसर करते थे। ग्रामीण ऐसा करने से खुश थे, क्योंकि वे गोपाला के माता-पिता का बहुत सम्मान करते थे, जो शास्त्रों में बताए गए प्राचीन आध्यात्मिक आदर्शों के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते थे।
गोपाला के स्कूल जाने की उम्र हो गई थी। हालाँकि उसकी माँ पूरे दिन अपने बेटे के साथ न रहने के विचार से दुखी थी, लेकिन उसने गोपाला को शिक्षा प्रदान करने का दृढ़ निश्चय किया, क्योंकि उसके पिता उसे शिक्षित करना चाहते थे। एक शुभ दिन गोपाला की माँ ने उसे साफ धोती-कपड़ा पहनाकर स्कूल के लिए विदा किया। घर के दरवाजे पर खड़े होकर वे तब तक उसे देखती रही, जब तक वह जंगल के रास्ते में उनकी आँखों से ओझल नहीं हो गया।
गोपाला अपने छोटे कदमों से कुछ दूर ही गया था कि वह दौड़ते हुए वापिस आया, “माँ” वह रोते हुए बोला, “मुझे डर लग रहा है! जंगल में अँधेरा है और कई अजीब आवाजें आ रही हैं। मैं स्कूल नहीं जा सकता!”
बेचारे गोपाला को अपनी माँ के सामने यह स्वीकार करने में शर्म आ रही थी, लेकिन फिर भी, वह अकेले अंधेरे जंगल की भयानक परछाइयाँ और शोर के डर का सामना नहीं कर सका। उसकी माँ निराश थी। गरीब विधवा माँ इतनी समर्थ नहीं थी कि वे अपने बच्चे को स्कूल ले जाने के लिए किसी को मदद के लिए रखती। लेकिन अचानक उन्हें इसका उत्तर मिल गया! भगवान कृष्ण निश्चित रूप से हमारी मदद करेंगे!
गोपाला की माँ भगवान कृष्ण की एक दिव्य बालक के रूप में भक्ति करती थी। उन्होंने हमेशा बाल कृष्णा की अपने छोटे बच्चे, जिसका नाम उन्हीं के नाम के रूप में गोपाला रखा था, के रूप में प्यार से सेवा की थी।
उन्होंने गोपाला को अपने गोद में लिया और बोली, “डरने की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हारा एक बड़ा भाई भी है, जो तुमको जंगल पार करा देगा। वह जंगल और खेतों में गायों की देखभाल करता है। उसके गायों के झुंड का रास्ता तुम्हारे स्कूल के रास्ते से दूर नहीं है। अगर तुम उससे रास्ता पूछोगे तो वह तुम्हें खुशी-खुशी वहाँ ले जाएगा। बस तुम उसे आवाज देना,” चरवाहे वाले भाई, आओ मेरी रक्षा करो! “और वह निश्चय तुम्हारी सुनेगा और मार्ग में तुम्हारा साथ देगा और फिर तुम खुशी-खुशी स्कूल पहुँच जाओगे।”
गोपाला ने रोना बंद कर दिया। “क्या यह सच है, माँ? क्या मेरा भाई सच में मुझे जंगल में से ले जाने आएगा?”
“हाँ, मेरे बेटे, यह उतना ही सच है जितना यह सच कि हमारे प्यारे भगवान हर समय हमारा ध्यान रखते है।”
“फिर तो मुझे स्कूल जाने में खुशी होगी।” गोपाला ने कहा और वह खुशी से जंगल के लिए निकल गया।
हालाँकि अभी वह बहुत दूर ही गया था, पर उसे घबराहट महसूस होने लगी। मार्ग पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था और पेड़ों की सरसराहट और अनदेखे (लेकिन अनसुने नहीं!) जंगली जानवरों को छोड़कर, जंगल में सन्नाटा था। गोपाला का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसे हर पेड़ के पीछे की परछाइयाँ जीवित लग रही थीं और उसे वह परछाइयाँ जंगल के खूंखार जानवरों के समान दिख रहीं थी। वह जल्दी से अपनी माँ के पास वापस जाने के लिए मुड़ा।
तभी उसे उसकी माँ की बात, उनका आश्वस्त करने वाला स्वर याद आया, जब उन्होंने उसे उसके चरवाहे भाई के बारे में बताया था।
“हे मेरे भाई!” वह रोते हुए बोला, “हे चरवाहे भाई! आओ मेरे साथ स्कूल चलो, क्योंकि मुझे जंगल से डर लगता है!”
तभी उसने पत्तों में कदमों की सरसराहट सुनी। झाड़ियों में से भागते हुए एक सुंदर लड़के ने पेड़ की शाखाओं के बीच से अपना सिर निकाला। उसने मोर पंख वाला सुनहरा मुकुट पहना था। उस बालक ने गोपाला को बड़े मित्रवत ढंग से मुस्कुराकर देखा और फिर झाड़ियों के पीछे से कूद कर उसका हाथ पकड़ लिया।
स्कूल जाने के पूरे रास्ते तक वे नाचते-गाते रहे। गोपाला को ऐसा साथ कभी नहीं मिला था। सौंदर्य और प्रेम से भरा, विनम्र और दयालु। उसके पास जबरदस्त ताकत थी, पर फिर भी वह इतना विनम्र था कि गोपाला अपने सभी डर भूल गया। वास्तव में, वह अपने साथी से मिलने की खुशी में सब कुछ भूल गया।
उस दिन से, गोपाला अपने वन यात्रा की शुरुआत में ही अपने चरवाहे भाई को बुलाने के लिए उत्सुक रहता था और उसका वह नया अद्भुत साथी भी उसके साथ प्रेम से जुड़ गया। वह नया साथी अपनी बांसुरी बजाता था और अपने साथी के साथ में हँसते, कूदते, नाचते, गाते पूरा जंगल नाप लेता। अब गोपाला को अक्सर महसूस होता कि जंगल की वह यात्रा वास्तव में बहुत छोटी है और काश उसका चरवाहा भाई उसके साथ और अधिक समय तक रह सकता। लेकिन उसके उस दोस्त को अपनी गायों के झुंड की देखभाल करनी होती थी।
और उधर गोपाला की माँ अपने बच्चे के उस अद्भुत दोस्त के बारे में सुनकर कृतज्ञता से भर उठी। उसने भगवान कृष्ण को दिल ही दिल में धन्यवाद दिया, उसे यह बिल्कुल स्वाभाविक लग रहा था कि कृष्ण, एक बड़े भाई की तरह अपने छोटे भाई की देखभाल कर रहे हैं।
एक दिन स्कूल मास्टर ने अपने विद्यार्थियों से कहा कि, “वे गाँव में एक शादी की तैयारी कर रहे हैं और प्रत्येक छात्र जो दूल्हा-दुल्हन के लिए उपहार-भोजन, कपड़े, मिठाई आदि का योगदान करना है।” जब गोपाल ने अपनी माँ से पूछा, “मैं अपने पूज्य गुरु के लिए क्या ले जाऊँगा?” तो वे दुखी हो गई। क्योंकि उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था। लेकिन जल्द ही उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई क्योंकि उन्हें बाल कृष्ण की याद आ गई। उन्हें विश्वास था कि वे निश्चित रूप से हमेशा की तरह उनकी मदद करेंगें।
“कल, स्कूल जाने के रास्ते में, जंगल में अपने भाई से पूछना। वह जानता है कि हमारे पास इस दावत में देने के लिए कुछ भी नहीं है और निस्संदेह उसके पास कुछ सुंदर उपहार होगा, जिसे तुम स्कूल मास्टर के पास ले जा सकोगे।”
अगली सुबह हमेशा की तरह उसने बाल चरवाहे को पुकारा और फिर उसके साथ स्कूल तक खेलता गया। लेकिन जैसे ही चरवाहा वापस जंगल में जाने के लिए मुड़ा, गोपाला को अचानक शादी की बात याद आ गई।
“हे भाई,” उसने कहा, “कृपया मेरी मदद करो। मेरे पास स्कूल मास्टर को देने के लिए कुछ भी नहीं है और आज उसके यहाँ शादी की दावत है और मुझे उनके लिए उपहार ले जाना है। क्या तुम मुझे कुछ दे सकते हो, जिसे मैं उपहार स्वरूप ले जा सकूँ?”
गोपाला का प्यारा साथी खिलखिलाकर हँस पड़ा। “मेरे पास देने के लिए क्या है? मैं तो केवल एक भटकता हुआ चरवाहा हूँ!”
गोपाला ने उसे गुस्से से देखा, तो बाल चरवाहा बोला, “ठीक है, मेरे पास कुछ है, शायद तुम्हारे शिक्षक इसे स्वीकार करेंगे।” चरवाहा दोस्त एक पल के लिए पेड़ों के पीछे गायब हो गया। जब वह लौटा तो उनके पास ताजा दही का एक छोटा कटोरा था। “मेरे पास बस यह ही है, गोपाला। इसे अपने स्कूल मास्टर को यह कहते हुए दे देना कि एक गरीब लड़का यही दे सकता है।”
गोपाला ने अपने मित्र को धन्यवाद दिया और स्कूल की ओर निकल गया। सभी छात्र अपने शिक्षक के सामने इकट्ठा हुए, उन्होंने अपने माता-पिता द्वारा तैयार किए गए उपहारों को भेंट किया। गोपाला का दही का छोटा कटोरा, सुंदर कपड़ों, मिष्ठान, नमकीन, खाद्य पदार्थों और फलों की बड़ी-बड़ी टोकरियों के बीच इतना अजीब लग रहा था कि किसी ने भी गोपाला के उस दही के कटोरे की तरफ ध्यान नहीं दिया। गोपाला के गालों पर आँसू लुढक आए क्योंकि वह उस दही के कटोरे को एक कीमती उपहार मान रहा था, जो उसके प्यारे चरवाहे भाई ने उसे दिया था।
दयालु हृदय वाले स्कूल मास्टर ने उसे रोते हुए देखा और उसे पास आने के लिए कहा। उन्होंने उससे कटोरा लिया और प्रशंसा के भाव के साथ दही को एक बड़े बर्तन में खाली कर दिया, यह सोचकर कि वह उस कटोरे को उस गरीब को लौटा देगा।
लेकिन जैसे ही उन्होंने मुस्कुराते हुए गोपाल को कटोरा थमाया, एक अजीब बात हुई। खाली कटोरा अचानक फिर से दही से भर गया। स्कूल मास्टर ने पुनः उसे बड़े बर्तन में खाली कर दिया लेकिन जैसे ही उन्होंने दही को अपने बड़े बर्तन में डाला, कटोरा फिर से दही से भर गया।
चकित स्कूली बच्चों ने गोपाला से पूछा, “तुमको यह अद्भुत कटोरा किसने दिया?” गोपाला भी उतना ही चकित था और पहली बार उसे लगा कि उसका वन का साथी वास्तव में है कौन? उसने बड़े विस्मय के साथ उत्तर दिया, “मेरे चरवाहे भाई ने मुझे यह दिया।”
स्कूल मास्टर आश्चर्य से उठ खडे हुए। “तुम्हारा यह चरवाहा भाई कौन है?”
“वह हमेशा आता है, जब-जब मैं उसे बुलाता हूँ और वह मेरे साथ जंगल तक चलता है। वह मोर पंख के साथ एक सुनहरा मुकुट पहनता है और अपनी बांसुरी पर मंत्रमुग्ध करने वाले गीत गाता है।”
“मुझे इस चरवाहे से मिलाने ले चलो।” स्कूल मास्टर की आवाज उत्तेजना से काँप रही थी। लेकिन उसके चेहरे के भाव से लग रहा था कि उसका यह दृढ़ विश्वास हिल गया था कि जब इतने वर्षो के शास्त्रों के अध्ययन के पश्चात भी उसे ईश्वर के दर्शन नहीं हुए तो इस नटखट बालक को ईश्वर के दर्शन कैसे हो सकते हैं?
स्कूल मास्टर और गोपाला जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल के किनारे पर पहुँचकर बालक गोपाला ने अपने सामान्य तरीके से उसे पुकारा, “मेरे भाई! आओ और मेरे साथ खेलो!”
जंगल में सन्नाटा पसरा रहा और “मैं जानता हूँ” का अभिमानी भाव स्कूल मास्टर के चेहरे पर आ गया। यह देखकर गोपाला जोर-जोर से रोने लगा, “मेरे चरवाहे भाई, अगर तुम नहीं आओगे, तो यह मुझ पर हँसेंगे और कहेंगे कि मैं झूठा हूँ।”
पत्तों में हल्की-सी सरसराहट हुई और हवा के झोंके के साथ दूर से एक आवाज आई। “मेरे छोटे भाई, मैं उन लोगों के पास जल्दी से आता हूँ, जो सच्चे और पवित्र ह्रदय से मुझे पुकारते हैं, लेकिन मैं आपके ‘संदेह से भरे’ शिक्षक को अपना चेहरा नहीं दिखा सकता। उन्हें अपने दिल में देखने दो और वे जान जाएँगे कि वे मुझे अपनी आँखों से क्यों नहीं देख पा रहे है।”
“इतने सालों में एक खूबसूरत चीज़ जो मैंने सीखी है, वह यह कि प्रेम हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। वे लोग जिनके हृदय कठोर तथा चेहरे रूखे होते हैं, ईश्वरीय कृपा को रोक देते हैं जबकि ख़ुशी से भरा हृदय इसे स्वाभाविक रूप से अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।”
दाजी








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