उदारताक्या हम सोच सकते है कि किसी के प्रति जरा सी उदारता उसका पूर्ण जीवन बदल सकती है?

उदारता
क्या हम सोच सकते है कि किसी के प्रति जरा सी उदारता उसका पूर्ण जीवन बदल सकती है?

उदारता

बात है 1943 की, जब डॉ.कुलकर्णी हुबली में स्थित एक युवा चिकित्सक थे। 22 वर्ष के डॉक्टर आर. एच. कुलकर्णी को महाराष्ट्र-कर्नाटक बॉर्डर पर स्थित चंदगढ़ गाँव के अस्पताल में नौकरी मिली। यह गाँव कम आबादी वाला और घने जंगल से घिरा हुआ था।

उस दिन जुलाई का महीना था। तूफानी रात में तेज बारिश हो रही थी और डॉक्टर कुलकर्णी उस समय किताब पढ़ रहे थे। ऐसे समय मे उनके घर के मुख्यद्वार पर जोर-जोर से दस्तक हुई। उन्होंने मन ही मन सोचा कि इस वक्त कौन हो सकता है? थोड़ा दिल में डर लिए उन्होंने दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उन्होंने क्या देखा कि चार आदमी ऊनी वस्त्रों में लिपटे हुए थे, उनके हाथों में लठ थी। और उन्होंने मराठी में डॉक्टर से कहा, “आप अपना बैग लो और तुरंत हमारे साथ चलो।”

डॉक्टर ने मन ही मन सोचा अभी इनसे विरोध करने से कुछ नहीं मिलेगा, इसीलिए उन्होंने चुपचाप अपना बैग लिया और उनके साथ चल पड़े। डरते डरते उन्होंने उन लोगों से पूछा कि,” आप मुझे कहाँ ले जा रहे हो?” कोई जवाब न मिलने पर वह खामोश होकर बैठे रहे। करीब डेढ़ घंटे बाद गाड़ियाँ रुकी। चारों ओर गहरा अंधेरा था। लठैतो ने डॉक्टर को गाड़ी से उतारा और एक कच्चे मकान में ले आए। जिसके एक कमरे में लालटेन की रोशनी थी, और खाट पर एक गर्भवती युवती लेटी हुई थी। जिसके बगल में एक वृद्ध महिला बैठी थी। डॉक्टर साहब यह सब देखकर अंदर से हिल गए, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था, इतने में उनको बताया गया कि डॉक्टर को उस युवती की डिलीवरी कराने के लिए लाया गया है।

दर्द से कराह रही उस लड़की को देखकर डॉक्टर का दिल पिघल गया। हालाँकि इससे पहले उन्होंने कभी भी डिलेवरी नहीं करवाई थी, पर उन्होंने मन ही मन फैसला किया कि मैं इस तूफानी रात में इस लड़की की मदद जरूर करूँगा और उन्होंने उस लड़की की तरफ देखते हुए उससे पूछा, “तुम कौन हो? और यहाँ कैसे?”

युवती दर्द भरे स्वर में डॉक्टर से बोली, “डॉक्टर साहब, मैं जीना नहीं चाहती।” यह कहते हुए उसने अपनी आपबीती सुनाई, “मैं यहाँ के एक बड़े ज़मीदार की बेटी हूँ।”

आगे उसने कहा, “चूँकि हमारे गाँव में कोई हाई स्कूल नहीं था, इसीलिए मेरे माता पिता ने मुझे दूर के शहर में पढ़ने भेज दिया। मुझे अपने एक सहपाठी से प्यार हो गया। इस दौरान … मैं गर्भवती हो गई। जब मुझे इस बात का पता चला तो मैंने तुरंत ही उस लड़के को बताया। वह यह बात सुनते ही तुरंत भाग गया। यह बात जब तक मेरे माता-पिता को पता चली तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इसीलिए उन्होंने मुझे यहाँ इस स्थान पर भेज दिया, जहाँ किसी को इस बात का पता न चले।” इतना कहते ही वह लड़की जोर जोर से रोने लगी।

डॉक्टर साहब डिलेवरी की तैयारी करने लगे। डॉक्टर कुलकर्णी के प्रयास से युवती ने एक कन्या शिशु को जन्म दिया, लेकिन जन्म लेने बाद वह कन्या रोई नहीं। जब उस युवती को इस बात का पता चला तो वह कहने लगी, “बेटी है ना, मरने दो उसे वरना मेरी ही तरह उसे भी दुर्भाग्यपूर्ण जीवन जीना पड़ेगा।”

इतना सुनने के बावजूद डॉक्टर कुलकर्णी ने उस शिशु कन्या को बचाने की भरसक कोशिश की और उनके प्रयासों से कन्या शिशु रो पड़ी। प्रसूति संपूर्ण हो जाने के बाद डाॅक्टर जब कमरे से बाहर आए तो उन्हें उनकी फीस 100 रुपए दी गई। उस जमाने में 100 रुपए एक बड़ी रकम होती थी। और उस समय डॉक्टर साहब मासिक ₹75 वेतन से नौकरी करते थे। फीस लेने के बाद डॉक्टर साहब को अचानक से याद आया कि वह अपना बैग उस कमरे में भूल आए हैं। अपना बैग लेने के बहाने डॉक्टर कुलकर्णी पुनः उस कमरे में गए और उन्होंने वो 100 रुपए उस युवती के हाथ पर रख दिए और बोले, “सुख-दुख इंसान के हाथ में नहीं होते, बहन, लेकिन सब कुछ भूलकर तुम अपना और इस नन्ही जान का खयाल रखो। जब सफर करने के काबिल हो जाओ तो पुणे के नर्सिंग कॉलेज पहुँचना। वहाँ आपटे नाम के मेरे एक मित्र हैं, उनसे मिलना और कहना कि डॉक्टर आर. एच. कुलकर्णी ने भेजा है। वे जरूर तुम्हारी सहायता करेंगे। इसे एक भाई की विनती समझना। मैं अभी इससे अधिक तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर पाऊँगा।” उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा और वहाँ से निकल गए।

इस घटना को कई वर्ष बीत गए। बाद के वर्षों में डॉक्टर आर. एच. कुलकर्णी को स्त्री-प्रसूती में विशेष प्रावीण्य मिला। एक बार, डॉक्टर कुलकर्णी एक मेडिकल कॉन्फ्रेंस अटेंड करने औरंगाबाद गए और वहाँ एक अतिउत्साही और ब्रीलियेन्ट डॉक्टर चंद्रा की स्पीच सुन बेहद प्रभावित हुए। इसी कार्यक्रम में किसी ने डाॅक्टर कुलकर्णी को उनका नाम लेकर आवाज दी, तो डॉक्टर चंद्रा का ध्यान उधर आकर्षित हुआ और वह तुरंत डॉक्टर कुलकर्णी के करीब पहुँची और उनसे पूछा, “सर, क्या आप कभी चंदगढ़ में भी थे?”

डॉक्टर कुलकर्णी : “हाँ, था। लेकिन ये बरसों पहले की बात है।”

डॉक्टर चंद्रा, “तब तो आपको मेरे घर आना होगा, सर।”

डॉक्टर कुलकर्णी : “डॉक्टर चंद्रा, आज मैं पहली बार तुमसे मिला हूँ। तुम्हारी स्पीच भी मुझे बहुत अच्छी लगी, तुम्हारे ज्ञान और रिसर्च की मैं तारीफ करता हूँ। मैं आज तुम्हारे साथ नहीं चल सकता, फिर कभी जरूर चलूँगा।”

इतना सुनते ही डॉक्टर चंद्रा बोल पड़ी, “सर, प्लीज, आज आप कुछ देर के लिए मेरे घर चले, मैं जीवन भर आपकी आभारी रहूँगी।” डॉक्टर चंद्रा के इतना प्यार से बुलाने पर डॉक्टर कुलकर्णी उन्हें मना नहीं कर पाए। अंततः डॉक्टर चंद्रा, डॉक्टर कुलकर्णी को साथ ले, अपने घर पहुँची और आवाज लगाई, “माँ, देखो तो हमारे घर कौन आया है!”

डॉक्टर चंद्रा की माँ आई, और उन्होंने अपने सामने डॉक्टर कुलकर्णी को देखा और पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, उनको अपने सामने पाकर। उनकी आँखें अश्रु से भर गई और अपने आप को संभाल कर वह उनके पास आई और उनके पैरों पर गिर पड़ी।

डॉक्टर कुलकर्णी घबरा गए और वह कुछ समझ पाते उससे पहले पुरानी कहानी याद दिला कर वह बोली : “डॉक्टर साहब, मैं वहीं युवती हूँ, जिसको आपने चंदगढ के पास गाँव में आधी रात को प्रसव पीड़ा में मदद की थी। और फिर आपके कहने पर मैं पुणे गई और वहाँ स्टाफ नर्स बनी। अपनी बेटी को मैंने खूब पढ़ाया और आपको ही आदर्श मानकर स्त्री विशेषज्ञ डॉक्टर बनाया। मेरी बेटी चंद्रा वही बच्ची है जिसने आपके हाथों उस दिन जन्म लिया था।”

डॉक्टर आर. एच. कुलकर्णी यह सब सुनकर आश्चर्यचकित हो गए और बहुत खुश हुए और डॉक्टर चंद्रा से बोले, “लेकिन तुमने मुझे पहचाना कैसे?”

डॉक्टर चंद्रा ने कहा “मैंने आपको आपके नाम से पहचाना सर। मैंने अपनी माँ को सदा आपके नाम का ही जाप करते देखा है।”

भावविभोर हुई डॉक्टर चंद्रा की माँ बोली, “डॉक्टर साहब, आपका नाम रामचंद्र है न। तो उसी नाम से लेकर मैंने अपनी बेटी का नाम चंद्रा रखा है।आपने हमें नया जीवन दिया। चंद्रा भी आपको ही आदर्श मान, गरीब महिलाओं का निशुल्क इलाज करती है।”

डॉक्टर आर. एच. कुलकर्णी समाज सेविका, सुप्रसिद्ध लेखिका और इन्फोसिस की चेयरपर्सन श्रीमती सुधा मूर्ति के पिता थे।

*कभी-कभी एक छोटी सी प्रेरणा और प्रोत्साहन ही दूसरों को उनके लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए काफ़ी होता है
*”अपनी प्रचुरता को उनके साथ बाँटें जो असमर्थ हैं। उदारता हमारी स्वाभाविक दशा है।”*   
*दाजी*

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