जय सदगुरुदेव स्वामी जी अपने समय में देश में पांच आश्रमों की स्थापना की जिसे विहंगम योग का तीर्थ भी कहते है।

जय सदगुरुदेव स्वामी जी अपने समय में देश में पांच आश्रमों की स्थापना की जिसे विहंगम योग का तीर्थ भी कहते है।

जय सदगुरुदेव
स्वामी जी अपने समय में देश में पांच आश्रमों की स्थापना की जिसे विहंगम योग का तीर्थ भी कहते है। इन अध्यात्मिक तीर्थो के दर्शन मात्र से हमारी आत्मिक चेतना उर्ध होने लगती है और वहां के अध्यात्मिक परमाणु हमे अपनी ओर आकृष्ट करने लगते है। महर्षि सदाफल देव जी महाराज ने अपने जीवन काल में जिन पांच प्रमुख आश्रमों की स्थापना की थी, जहाँ पर रहकर आपने साधना का सर्वोच्च सिखर प्राप्त किया था वो स्थान हम सबके लिए पावन तीर्थ बन गये है।

  1. बृति कूट आश्रम, पकड़ी
  2. सुकृत धाम झूंसी आश्रम, प्रयाग
  3. शून्य शिखर आश्रम, हिमालय
  4. दंडक वन आश्रम, गुजरात
  5. मधुमती आश्रम , गया , बिहार और
    एक महानं तीर्थ जिसका निर्माण अभी चल ही रहा है
  6. स्वर्वेद महामंदिर धाम , varanashi
  7. बृति कूट आश्रम, पकड़ी – विहंगम योग संस्थान का सबसे प्रमुख आश्रम यही है। यह आश्रम उतर प्रदेश के बलिया जनपद में बलिया शहर से करीब 32 किलो मीटर की दुरी पर पकड़ी ग्राम के बिलकुल पास है। इस आश्रम की विशेषता है की इसी आश्रम के पास स्थित पकड़ी ग्राम में स्वामी जी का अवतरण हुआ और इसी आश्रम की पर्णकुटी में आपने बाल्य काल से ही साधन अभ्यास प्रारंभ किया। इसी आश्रम की पावन बसुन्धरा पर सर्व प्रथम नित्य अनादी सद्गुरु ने साधू वेस में स्वामी जी को दर्शन देकर कृतार्थ किया। स्वामी जी इसका बर्णन स्वर्वेद में भी किये है।
    वृत्तिकुट मम धाम पर, सद्गुरु दर्शन दिन।
    मै अज्ञान अबोध में, चरण पकड़ नही लींन।।
    सद्गुरु दिन दयाल हो, कृपा सिन्धु गुरुदेव।
    वृतिकुट दर्शन दिए, मै अबोध नही सेव।।
    वृतिकुट का अध्यात्मिक अर्थ है – वृतियो को कूटस्थ ब्रम्ह की ओर उन्मुख करने वाला स्थान।
    इस आश्रम की महिमा का बर्णन करते हुए स्वामी जी ने शब्द प्रकाश में लिखा है-
    वृतिकुट सम याही जग, तीर्थ न प्रकट कोय।
    जीवन मुक्त दर्शन मिले, काक हंस पती होय।।
  8. सुकृत धाम झुंशी आश्रम – झुंशी आश्रम प्रयाग राज में गंगा यमुना संगम के थोडा आगे उतर पूरब को ओर स्थित है। इस आश्रम पर भी स्वामी जी को नित्य अनादी सदगुरुदेव ने दर्शन दिए है। स्वामी जी इसका संकेत स्वर्वेद में करते है। इसका संकेत संकट मोचन में भी किये है। स्वामी जी सबसे पहले उस स्थान पर 1903 इसवी में आये थे जिस समय वहाँ जंगल जैसा दृश्य हुआ करता था। इसी आश्रम पर स्वामी जी ने देह त्याग किया था और इसी स्थान पर 15 मिनट आकाशवाणी भी किये थे। यही पर स्वामी जी की समाधी भी है और साथ ही यह हमारा प्रधान कार्यालय भी है। यहाँ का दृश्य बिलकुल प्राकृतिक है। तीर्थो की भूमि प्रयाग पर एक महातीर्थ के रूप में ‘सद्गुरु सदाफल देव आश्रम’ है, जो स्वामी जी की तपस्थली है और उनके देह त्याग की भूमि है। आज यह अंतरार्ष्ट्रीय प्रचार केंद्र के रूप में पुजित है। यहाँ पर स्वामी जी की आध्यात्मिक परमाणु अभी भी कार्य कर रहे है। यह आश्रम रास्ट्रीय स्तर पर एक दर्शनीय स्थल के रूप में मान्य है।
    ३. शुन्यशिखर आश्रम, हिमालय – हिमालय एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है. यह ऋषि महर्षियो की तपः स्थली के रूप में विख्यात है. इसी हिमालय की श्रृंखला में उत्तराखंड का हिमालय है. इस उत्तराखंड हिमालय स्थित गढ़वाल छेत्र के अंतर्गत ही एक चोटी है जहां पर एक प्राकृतिक गुफा है जिसका नामकरण महर्षि सदाफलदेव जी महाराज ने ‘शून्य शिखर आश्रम’ किया है.
    सर्व प्रथम महर्षि सदाफलदेव जी महाराज इस स्थान पर सन १९३७ में आये थे. इस शून्य शिखर आश्रम के समीप इडामल्ला एक गाव है जहा के श्री बद्री सिंह नेगी जी स्वामी जी को इस स्थान पर लाये थे. यही महापुरुष स्वामी जी के शिष्य बन गए और उन्होंने अपनी कुछ जमींन स्वामी जी को दान में दिए जिस पर ये आश्रम स्थित है. यह आश्रम हिमालय की गोद में करीब १० हजार फिट की उचाई पर स्थित है. इसी शून्य शिखर आश्रम की कन्दरा में स्वामी जी ने ‘स्वर्वेद’ को पूर्ण किया था. इसी शून्य शिखर आश्रम पर स्वामी जी ने महाकल्प का प्रयोग किया था. इस आश्रम के आध्यात्मिक महिमा के सम्बन्ध में स्वामी जी ने स्वर्वेद में लिखा है
    शून्य शिखर की कन्दरा, योगिन कर यह धाम
    सर्वस सिद्ध प्रदायिनी, होवै पुराण काम
    सद्गुरु की यह कन्दरा, ज्ञान रतन की खान
    सिद्धपीठ यह जानिए, देवे पद निर्वाण
    यह सिद्ध जीवन मुक्त योगियों का धाम है.
    स्वामी जी आगे स्वर्वेद में बताते है
    शून्य शिखर पंगु चढ़े, चढ़ पगवान न जाय
    मन अरु पवन आभाव में, क्षिप्र उर्ध्व चढ़ जाय.
    शून्य शिखर पर वासकर, संत विवेकी होय
    तपन योगबल ज्ञानबल, संपादन कर सोय.
    उपर्युक्त दोहे में अध्यात्म का गूढ़ार्थ छिपा हुआ है. मन और प्राण जहां शांत हो जाते है, उस भूमि को शून्य कहते है. उस शून्य के शिखर यानि परमधाम समाधी मंडल को शुन्यशिखर कहते है.
    यहाँ हिमालय के प्राकृतिक दृश्य के साथ साथ पास में अनेक तपोभूमि है. सद्गुरु सदाफलदेव शुन्यशिखर आश्रम केवल उत्तराखंड का ही गौरव नही वल्कि हिमालय के साथ भारत का भी गौरव है.
    ४. दंडकवन आश्रम – विहंगम योग संस्थान के प्रमुख आश्रमों में दंडकवन आश्रम एक महत्वपूर्ण आश्रम है. यह वही अरण्य है जहाँ चित्रकूट से प्रस्थान करने के बाद भगवन राम निवास किये है. इस दंडकबन आश्रम से करीब ३०-३५ किलोमीटर की दुरी पर ‘बामनिया भुत’ नामक स्थान है यहाँ एक मंदिर है जिसके ऊपरी तल्ले पर स्वामी जी की एक संगमरमर की प्रतिमा बैठायी गयी है. इस प्रतिमा की स्थापना सितम्बर १९५८ को की गयी थी. इसी रास्ते में बहेवल चौराहा से मात्र २०० मीटर की दुरी पर एक छोटा सा स्थल है, जहाँ एक बोर्ड पर लिखा है की इसी स्थान पर सन १९७५ में द्वितीय परम्परा सद्गुरु आचार्य श्री स्वतंत्रदेव जी महाराज को नित्य अनादि सद्गुरु के दर्शन हुए थे. दंडकवन आश्रम पर ही बड़े स्वामी जी को भी नित्य अनादि सद्गुरु के दर्शन हुआ था. यही पर बड़े स्वामी जी ने अपने नख और केश की समाधी भी दी थी. इस मदिर के भूतल में तीन मंदिर (स्वामी जी की ब्रह्वेदी, नख और केश की ससमाधि तथा नित्य अनादि सद्गुरु का प्राकट्य स्थल) एक साथ बने हुए है. स्वयं स्वामी जी ने इस आश्रम की महिमा का बर्णन करते हुआ कहा है ” यह दंडकवन आश्रम सद्गुरु धाम है. इसकी महिमा अपार है. जो बिरही या बिरहिनी यहाँ पर इस दंडकवन में आयेगे, इस परमधाम का दर्शन करेंगे या निवास करेंगे वे भक्ति तथा मुक्ति के अधिकारी होगे” दंडकवन आश्रम न केवल गुजरात प्रान्त के लिए, वल्कि पुरे विहंगम संत समाज के लिए एक पावन तीर्थ के रूप में पूजित है और पूरा विहंगम परिवार इस आश्रम की आध्यात्मिक गरिमा से स्वयं गौरवान्वित अनुभव करता है.
    ५. मधुमती आश्रम – इस आश्रम की भी स्थपना बड़े स्वामी जी ने ही किया था. यह आश्रम बिहार के गया में स्थित है. बिहार प्रान्त में स्वामी जी का प्रचार सन १९२५ से ही था. स्वामी जी बिहार में प्राचार्थ कई स्थानो पर जाते थे. विशेष रूप से उनका प्रचार गया जिले के बिभिन्न जिलो में था. यह आश्रम जहानाबाद से २-३ किलोमीटर की दुरी पर है. वहाँ पर सर्व प्रथम स्वामी जी के लिए एक पर्णकुटी बनायीं गयी थी. जिसका नाम मधुमती आश्रम रखा गया था. सन १९४२ में ही मधुमती आश्रम की स्थपना हुयी थी. मधुमती का अर्थ ब्रम्हविद्या, पराविद्या या विहंगम योग ही होता है. स्वामी जी ने मधुमती नाम से एक पदावली भी लिखी है. इसी स्थान पर जनवरी १९५० में आध्यत्मिक यंत्रालय की स्थपना की गयी और इसी प्रेस से सर्वप्रथम “सहजोपनिषद्” तथा उसके बाद “चतुर्वेदीय ब्रम्हविद्या भाष्य” का प्रकाशन किया गया. उसी समय “सद्गुरु सन्देश” नमक आध्यात्मिक मासिक पत्रिका सन १९५० को यही से प्रकाशन किया गया. प्रथमाचार्य जी तो प्रेस की सारी व्यस्था एवं प्रचार आदि अधिकतर इसी स्थान पर रहकर करते थे. पीतरो की नगरी गया सारे हिन्दू समाज में पिंडदान के लिए प्रचलित है. साथ ही इसी गया में भगवन बुद्ध को भी ज्ञान प्राप्त हुआ था. पितरो की पवित्र नगरी गया के साथ विश्व के बौद्ध धर्मावलम्बियों की आस्था के केंद के रूप में पास में ही बोधगया स्थित है जो बौद्ध मंदिरो के लिए विख्यात है. सबसे बढ़कर ब्रम्हविद्या योग जिसे “मधुमती” भी कहा गया है, उस ज्ञान के प्रकाश से यह आश्रम परिषर ओत प्रोत है. यहाँ आकर दर्शको को अपूर्व शांति प्राप्त होती है.
    ६. स्वर्वेद महामंदिर धाम – विहंगम योग के पांच प्रमुख आश्रमों की स्थापना परम आराध्य सद्गुरुदेव अनंत श्री स्वामी सदाफलदेव जी महाराज के द्वारा की गयी थी. इन सबसे अलग स्वामी जी की महान आध्यात्मिक कृति स्वर्वेद के पवित्र दोहो को दीवाल पर अंकित कर उसे सबके लिए सुलभ और दर्शनीय बनाने के उदेश्य से एक भव्य मंदिर का निर्माण द्धितीय परम्परा सद्गुरु अनंत श्री आचार्य स्वतंत्रदेव जी महाराज के द्वारा सन २००१ से प्रारम्भ कराया गया है जो अभी निर्माण के अंतिम चरण में है. इस महामंदिर में महर्षि सदाफलदेव जी महाराज द्वारा लिखित महान सद्ग्रन्थ “स्वर्वेद” को संगरमर पर अंकित करके दर्शको के लिए सहज और सुलभ बनाया जा रहा है. स्वामी जी स्वर्वेद के बारे में लिखते है की स्वर्वेद हमारे अंतर की चिंतामणि, चेतन प्रकाश एवं हमारे ह्रदय मंदिर का अखंड दिव्य ज्योति है. सच्चे अनुरागियों के लिए यह अमृतधारा है.
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